सीनियर एडवोकेट पिनाकी मिश्रा के खिलाफ मानहानि का मामला रद्द, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- प्रथमदृष्टया अपराध नहीं बनता
दिल्ली हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट पिनाकी मिश्रा के खिलाफ चल रहे आपराधिक मानहानि का मामला रद्द किया। मामला एक समाचार पोर्टल को दिए कथित साक्षात्कार में शिकायतकर्ता को 'ठग' और 'ब्लैकमेलर' कहने के आरोप से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से प्रथमदृष्टया यह साबित नहीं होता कि कथित टिप्पणी से शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा दूसरों की नजर में कम हुई थी।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि शिकायतकर्ता ने निचली अदालत के समक्ष समन जारी होने से पहले की कार्यवाही में खुद को ही एकमात्र गवाह के रूप में पेश किया। रिकॉर्ड में ऐसा कोई अन्य बयान या सामग्री नहीं थी जिससे यह प्रथमदृष्टया साबित हो सके कि कथित टिप्पणी से शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
अदालत ने कहा कि केवल यह दावा करना कि प्रकाशन से प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 के स्पष्टीकरण 4 में निर्धारित कानूनी आवश्यकता को पूरा नहीं करता।
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने वर्ष 2018 में दिल्ली बार काउंसिल में पिनाकी मिश्रा के खिलाफ शिकायत की थी। आरोप लगाया गया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष बिजली वितरण कंपनियों की ओर से उनकी पेशी पेशेवर कदाचार के दायरे में आती है। 26 अगस्त 2018 को इस शिकायत से संबंधित एक समाचार प्रकाशित हुआ।
इसके बाद आरोप लगाया गया कि 24 जनवरी 2019 को समाचार पोर्टल पर प्रकाशित साक्षात्कार में मिश्रा ने शिकायतकर्ता के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं, जिससे उसकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा और पेशेवर जीवन प्रभावित हुआ। इसी आधार पर वर्ष 2019 में आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह सही है कि किसी मामले में संज्ञान लेने या समन जारी करने के स्तर पर अदालत को साक्ष्यों का बारीकी से मूल्यांकन करने या मुकदमे जैसा विस्तृत परीक्षण करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अपराध के मूल तत्वों के प्रथमदृष्टया सामने आने की आवश्यकता ही खत्म हो जाती है।
मामले में पिनाकी मिश्रा ने कथित साक्षात्कार देने से साफ इनकार किया। उन्होंने 22 मार्च 2019 को समाचार संस्थान ओडिशा पोस्ट के संपादक को पत्र भेजकर भी कथित साक्षात्कार देने से इनकार किया और इस संबंध में स्पष्टीकरण प्रकाशित करने का अनुरोध किया।
अदालत ने इस पहलू को भी महत्वपूर्ण माना कि निचली अदालत के समक्ष उस समाचार के संबंधित पत्रकार, लेखक, संपादक या समाचार पोर्टल से जुड़े किसी अन्य व्यक्ति की गवाही नहीं कराई गई। ऐसे में कथित बयान वास्तव में मिश्रा ने ही दिया था, यह स्थापित करने वाली कोई स्वतंत्र सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं थी।
पीठ ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता ने बाद में उसी समाचार पोर्टल के संपादक और मालिक को भी मामले में आरोपी बनाया था। अदालत के अनुसार समाचार प्रकाशन के अलावा मिश्रा को कथित बयान से जोड़ने वाली कोई स्वतंत्र सामग्री मौजूद नहीं थी।
समग्र परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि मिश्रा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने खुद को एकमात्र गवाह के रूप में पेश करने के बावजूद ऐसी सामग्री नहीं रखी जिससे प्रथमदृष्टया यह साबित हो कि कथित टिप्पणी ने दूसरों की नजर में उसकी प्रतिष्ठा कम की।
हाईकोर्ट ने पिनाकी मिश्रा के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला रद्द करते हुए याचिका मंजूर की।