CJP से 50 करोड़ मुआवजे की मांग वाली PIL पर दिल्ली हाईकोर्ट का सुनवाई से इनकार, सुप्रीम कोर्ट जाने की छूट दी
दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान आम लोगों को हुई परेशानी के लिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) पर 50 करोड़ रुपये का सामुदायिक जुर्माना लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार किया।
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि इसी तरह के मुद्दे पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने की छूट देते हुए याचिका का निपटारा किया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा के दौरान उन आम नागरिकों के अधिकारों पर भी विचार किया जाना चाहिए, जिन्हें प्रदर्शनों के कारण परेशानी और नुकसान उठाना पड़ा।
याचिकाकर्ता ने कहा,
“आम जनता और उस सामान्य नागरिक के अधिकारों का क्या, जिसका एकमात्र दोष यह है कि उसने दिल्ली में रहने का फैसला किया और जिसकी रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित होती हैं?”
याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय को ऐसे दिशा-निर्देश बनाने का निर्देश देने की मांग की गई, जिनके तहत विरोध प्रदर्शनों के कारण आम नागरिकों को हुई परेशानी की भरपाई के लिए सामुदायिक जुर्माना लगाया और वसूला जा सके।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मुआवजे की व्यवस्था से भविष्य में संगठनों को इसी तरह की परेशानी पैदा करने से रोका जा सकेगा। उसने सुप्रीम कोर्ट में लंबित अन्य याचिकाओं का हवाला देते हुए कहा कि वे मुख्य रूप से ऐसी गतिविधियों को रोकने से संबंधित हैं, जबकि मौजूदा याचिका में प्रभावित आम नागरिकों को हुए नुकसान के लिए अंतरिम तौर पर 50 करोड़ रुपये देने की मांग की गई।
इस पर एक्टिंग चीफ जस्टिस सांब्रे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले पर विचार कर रहा है। उन्होंने याचिकाकर्ता से पूछा कि वहां लंबित कार्यवाही का दायरा क्या है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक याचिकाएं लंबित हैं।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि छोटे व्यापारियों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। इन व्यापारियों का दावा है कि विरोध प्रदर्शनों के कारण उनका कारोबार और आजीविका ठप हो गई थी।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि सामुदायिक जुर्माना लगाने से ऐसे संगठनों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी, अन्यथा उन्हें रोकने वाला कोई नहीं होगा और राज्य भी असहाय बना रहेगा।
इस पर कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी की,
“नहीं, नहीं, राज्य ने स्थिति संभाली है।”
सॉलिसिटर जनरल ने भी याचिकाकर्ता के दावे पर असहमति जताई, लेकिन सुझाव दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही में शामिल हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा जनहित कानून के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक अनुशासन की मांग कि जब इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही लंबित हो, तो हाईकोर्ट उससे अलग कोई ऐसा आदेश पारित करने से बचे जिससे विरोधाभास पैदा हो सकता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने याचिका के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी मांगों के साथ सुप्रीम कोर्ट जाने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निपटारा किया।