दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल सेक्रेटेरिएट क्लब के दो अधिकारियों को क्लब परिसर में जाकर अपना सामान और अन्य वस्तुएं ले जाने की अनुमति देने का केंद्र सरकार को निर्देश दिया। क्लब के पदाधिकारियों को परिसर से बेदखल किए जाने के बाद अदालत ने यह आदेश दिया। मामले की सुनवाई जस्टिस अमित महाजन ने की।

हाईकोर्ट क्लब की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा क्लब की मान्यता वापस लेने और परिसर से बेदखल करने के फैसले को चुनौती दी गई।

अदालत ने कहा कि क्लब वर्ष 1926 से काम कर रहा था। विवादित आदेश के बाद परिसर का कब्जा अधिकारियों ने अपने हाथ में ले लिया और क्लब की मान्यता भी समाप्त कर दी गई। अदालत को बताया गया कि क्लब के पदाधिकारियों को भी परिसर से बेदखल किया जा चुका है।

मामले की अंतिम सुनवाई नहीं हो पाने के कारण अदालत ने अधिकारियों को क्लब के दो प्रतिनिधियों को परिसर में जाने और वहां रखा अपना सामान तथा अन्य वस्तुएं एकत्र करने की अनुमति देने का निर्देश दिया।

अदालत ने आदेश दिया कि क्लब के दोनों अधिकारी परिसर का दौरा करने के बाद वहां से ले जाने वाली वस्तुओं की सूची संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध कराएंगे। इसके बाद अधिकारी सूची में शामिल सामान को क्लब को सौंपने की व्यवस्था करेंगे।

केंद्र सरकार की सरकारी वकील राधिका बिश्वजीत दुबे से संबंधित विभाग और क्लब के अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करने को कहा गया है, ताकि दो सप्ताह के भीतर अदालत के निर्देश का पालन सुनिश्चित किया जा सके। मामले में अगली सुनवाई 21 दिसंबर को होगी।

क्लब ने अपनी याचिका में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की ओर से 14 जुलाई को जारी मान्यता समाप्त करने के आदेश और संपदा अधिकारी द्वारा 17 जुलाई को पारित बेदखली आदेश रद्द करने की मांग की। याचिका के अनुसार, इन आदेशों के बाद 21 जुलाई को अधिकारियों ने परिसर का कब्जा ले लिया था।

क्लब का दावा है कि सेंट्रल सेक्रेटेरिएट क्लब, जिसे पहले टॉकीटोरा क्लब के नाम से जाना जाता था वर्ष 1919 में स्थापित एक ऐतिहासिक संस्था है। याचिका में मान्यता समाप्त करने और बेदखली के आदेशों को मनमाना तथा असंवैधानिक बताया गया।

क्लब के अनुसार, विवाद मार्च 2023 में उस समय शुरू हुआ, जब कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने चुनाव कराने के लिए दो महीने की अवधि हेतु एक तदर्थ प्रशासनिक समिति गठित की थी। क्लब का आरोप है कि समिति निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद भी करीब दो वर्ष तक काम करती रही और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किए।

याचिका में समिति पर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए। इनमें वस्तु एवं सेवा कर विवरणी दाखिल करने में देरी, वैधानिक बकाया का भुगतान नहीं करना, बार संचालन में अनियमितताएं, आवश्यक अभिलेखों का रखरखाव नहीं करना, आयकर विवरणी दाखिल नहीं करना, अनधिकृत भुगतान, कर्मचारियों को मनमाने ढंग से निलंबित करना और सदस्यता सत्यापन के दौरान सदस्यों के नाम हटाना शामिल हैं।

क्लब ने आरोप लगाया कि इन शिकायतों पर सुधारात्मक कार्रवाई करने के बजाय केंद्र सरकार ने 24 फरवरी को कार्यालय ज्ञापन जारी कर बिना कारण बताओ नोटिस दिए और सुनवाई का अवसर उपलब्ध कराए बिना क्लब की मान्यता वापस ले ली।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि अधिकारी अपनी प्रशासनिक विफलताओं और तदर्थ समिति की कथित अनियमितताओं का इस्तेमाल करके एक ऐतिहासिक संस्था को जबरन बेदखल करने और उसका अस्तित्व समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। क्लब ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया है। हालांकि, ये सभी आरोप याचिका में क्लब की ओर से लगाए गए हैं, जिन पर मामले की सुनवाई के दौरान विचार किया जाएगा।

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