ब्लैकलिस्टिंग पर अंतरिम राहत मिलने से टेंडर में पूरी जानकारी छिपाने का अधिकार नहीं मिलता : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी को ब्लैकलिस्टिंग आदेश पर अंतरिम राहत मिल जाने का यह मतलब नहीं है कि वह टेंडर प्रक्रिया में उससे जुड़ी जानकारी छिपा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बोलीदाता पर सभी तथ्यों का स्पष्ट और ईमानदार खुलासा करने की जिम्मेदारी बनी रहती है।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एम/एस वेलोसिस सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज की।
कंपनी ने नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर सर्विसेज इंकॉरपोरेटेड द्वारा जारी निविदा में तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित किए जाने को चुनौती दी थी।
मामला कार्यालय सहायता और परियोजना प्रबंधन सेवाओं के लिए एजेंसियों के पैनल गठन से जुड़ी निविदा का था। कंपनी की बोली इस आधार पर खारिज कर दी गई कि उसने ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित अधूरी और गलत जानकारी दी।
कंपनी का कहना था कि उसे 9 दिसंबर, 2025 को कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण द्वारा ब्लैकलिस्ट किया गया, लेकिन 29 दिसंबर, 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उस आदेश के संचालन पर रोक लगाई। चूंकि बोली 30 दिसंबर को जमा की गई, इसलिए गलत जानकारी देने का आरोप गलत है।
हालांकि NICSI ने अदालत में कहा कि कंपनी द्वारा दिया गया घोषणा-पत्र अस्पष्ट था और उसमें ब्लैकलिस्टिंग आदेश का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया।
अदालत ने पाया कि कंपनी ने अपने घोषणा-पत्र में लिखा था कि वह “ब्लैकलिस्ट नहीं है या सक्रिय ब्लैकलिस्टिंग अवधि में नहीं है।”
अदालत ने कहा कि यह बयान स्पष्ट और निर्विवाद नहीं था।
खंडपीठ ने कहा,
“टेंडर जारी करने वाली संस्था को यह अधिकार है कि वह ब्लैकलिस्टिंग से जुड़े सभी आदेशों और बाद की न्यायिक कार्यवाहियों का पूरा खुलासा मांगे। यह तय करना संस्था का अधिकार है कि अंतरिम राहत से ब्लैकलिस्टिंग का प्रभाव खत्म हुआ या नहीं।”
अदालत ने कहा कि बोलीदाता अपने स्तर पर यह मानकर नहीं चल सकता कि अंतरिम राहत मिलने के बाद खुलासा करने की जिम्मेदारी समाप्त हो गई।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक खरीद प्रक्रियाओं में स्व-घोषणाओं के आधार पर पात्रता तय होती है, इसलिए निर्धारित प्रारूप और स्पष्ट जानकारी का पालन बेहद महत्वपूर्ण है।
अदालत ने कहा,
“पात्रता से जुड़ी किसी महत्वपूर्ण घोषणा में अस्पष्टता को केवल तकनीकी त्रुटि नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब निविदा दस्तावेज में ऐसी स्थिति में सीधे अयोग्यता का प्रावधान हो।”
हाईकोर्ट ने दोहराया कि संवैधानिक अदालतें टेंडर प्राधिकरणों के फैसलों पर अपीलीय मंच की तरह काम नहीं करतीं, जब तक कि फैसला मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या निविदा शर्तों के खिलाफ न हो।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने कंपनी की याचिका खारिज की।