बैंकिंग अनुशासनात्मक जांच में गवाह न होने से कार्यवाही अमान्य नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि बैंकिंग अनुशासनात्मक जांच में प्रबंधन के गवाहों का न होना अपने आप में कार्यवाही को अवैध नहीं बनाता, यदि निष्कर्ष दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित हों।
जस्टिस संजीव नरूला ने यह टिप्पणी पंजाब नेशनल बैंक के एक सीनियर अधिकारी के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अधिकारी को ऋण स्वीकृति और निगरानी में कथित लापरवाही के आरोप में सेवा से बर्खास्त किया गया।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जांच में किसी भी प्रबंधन गवाह को पेश नहीं किया गया और पूरा मामला केवल दस्तावेजों के आधार पर बनाया गया, जिन्हें विधिवत साबित नहीं किया गया।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा,
“बैंकिंग मामलों में साक्ष्य का आधार अक्सर दस्तावेज होते हैं, न कि मौखिक गवाही। केवल गवाहों की अनुपस्थिति से निष्कर्ष अवैध नहीं हो जाते, जब तक यह न दिखाया जाए कि बिना मौखिक गवाही के आवश्यक तथ्य साबित नहीं हो सकते थे और इससे आरोपी को नुकसान हुआ।”
अदालत ने पाया कि जांच में ऋण स्वीकृति नोट, स्टॉक स्टेटमेंट, निरीक्षण रिपोर्ट और अनुपालन रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज शामिल थे, जिनके आधार पर निष्कर्ष निकाले गए।
हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा करते समय अदालत अपीलीय मंच की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करती।
अदालत ने कहा कि हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है, जब प्रक्रिया में कानूनी त्रुटि हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हो या निष्कर्ष पूरी तरह साक्ष्यविहीन या अविवेकपूर्ण हों।
हालांकि, अदालत ने यह माना कि बर्खास्तगी की सजा की कठोरता पर पुनर्विचार आवश्यक है। इस आधार पर मामले को सक्षम प्राधिकारी के पास वापस भेजते हुए दंड के पुनर्निर्धारण का निर्देश दिया गया।
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने जांच के निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन सजा के पहलू पर राहत दी।