एयर इंडिया के निजीकरण के बाद भी श्रम न्यायाधिकरण के फैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि एयर इंडिया के निजीकरण के बाद भी श्रम अदालत और औद्योगिक न्यायाधिकरण के फैसलों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाइकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
जस्टिस शैल जैन पूर्व एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस कर्मचारियों तथा कर्मचारी संगठनों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। इन याचिकाओं में केंद्रीय सरकारी औद्योगिक न्यायाधिकरण के उन आदेशों को चुनौती दी गई, जिनमें सेवा समाप्ति को अवैध मानने के बावजूद कर्मचारियों की बहाली के बजाय केवल आर्थिक मुआवजा दिया गया।
मामला 1993 से 1998 के बीच इंडियन एयरलाइंस में सहायक, चालक और अन्य सहयोगी पदों पर कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों से जुड़ा था। न्यायाधिकरण ने माना था कि कर्मचारियों की सेवा समाप्ति औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25-एफ का उल्लंघन थी, लेकिन बहाली के बजाय 25 हजार से 55 हजार रुपये तक का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
सुनवाई के दौरान एयर इंडिया ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि 2022 में निजीकरण के बाद कंपनी अब रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में नहीं आती।
इसके लिए एयर इंडिया ने आर.एस. मदिरेड्डी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि निजीकरण के बाद एयर इंडिया संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” की श्रेणी में नहीं आती।
हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मदिरेड्डी मामले में कर्मचारी सीधे एयर इंडिया के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे थे, जबकि वर्तमान मामले में पहले औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण में सुनवाई हुई और उसके बाद फैसले को चुनौती दी गई।
अदालत ने कहा,
“जब श्रम अदालत या औद्योगिक न्यायाधिकरण कोई फैसला देता है तो वह अनुच्छेद 226 और 227 के तहत न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है। ऐसे मामलों में रिट केवल निजी कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि न्यायाधिकरण की निर्णय प्रक्रिया और उसके आदेश के खिलाफ होती है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि एयर इंडिया की दलील मान ली जाए तो न्यायाधिकरण के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर हो जाएंगे, जो कानून की मंशा नहीं हो सकती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 17(2) सामान्य दीवानी अदालत में चुनौती पर रोक लगाती है, लेकिन हाईकोर्ट की संवैधानिक न्यायिक समीक्षा की शक्ति बनी रहती है।
मामले के गुण-दोष पर अदालत ने माना कि कर्मचारियों ने 240 दिनों से अधिक लगातार सेवा की थी और बिना नोटिस तथा बिना प्रतिकर दिए उनकी सेवा समाप्त की गई, जो कानून का उल्लंघन था।
हालांकि, अदालत ने कर्मचारियों की बहाली से इनकार करते हुए कहा कि वे लगभग तीन दशक पहले सीमित अवधि के लिए अस्थायी तौर पर नियुक्त किए गए। इसी आधार पर अदालत ने न्यायाधिकरण के आदेश में संशोधन करते हुए मामले का निस्तारण किया।