दिल्ली हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी से ससुराल वालों के साथ रहने या परिवार के सदस्यों की देखभाल में मदद करने को कहना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (CrPC) की धारा 498ए के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी करते हुए पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज FIR (धारा 498ए/406/34) और घरेलू हिंसा कानून के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की।

अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं जिनमें अपराध साबित करने के लिए आवश्यक ठोस विवरण नहीं हैं।

अदालत के अनुसार ये आरोप अधिकतर वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद और सामंजस्य की कमी को दर्शाते हैं, न कि आपराधिक कृत्य।

पत्नी ने आरोप लगाया कि उसकी ननद अविवाहित है और घर में रहकर पति के आर्थिक मामलों और संपत्ति से जुड़े निर्णयों पर प्रभाव डालती है।

इस पर अदालत ने कहा कि अविवाहित भाई के मामलों को परिवार के सदस्य द्वारा संभालना असामान्य नहीं है और इससे पत्नी को कोई नुकसान होने का स्पष्ट आरोप भी नहीं है।

दहेज को लेकर ताने दिए जाने के आरोप पर भी अदालत ने कहा कि ये केवल सामान्य और बिना ठोस आधार के लगाए गए आरोप हैं। इसी तरह सास के सर्दियों में कुछ महीनों तक साथ रहने को भी अदालत ने क्रूरता नहीं माना।

पत्नी ने यह भी कहा कि उससे परिवार के एक बच्चे की जिम्मेदारी लेने का दबाव बनाया गया।

इस पर अदालत ने स्पष्ट किया,

“केवल किसी पारिवारिक सदस्य की देखभाल में मदद करने को कहना अपने आप में IPC की धारा 498ए के तहत क्रूरता नहीं बनता।”

अदालत ने यह भी पाया कि धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत लगाए गए आरोपों में भी यह नहीं बताया गया कि कौन-सी संपत्ति सौंपी गई और उसका दुरुपयोग कैसे हुआ।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि इस मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा।

इसी आधार पर अदालत ने FIR और संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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