CEC के खिलाफ प्रदर्शन से पहले 57 मेट्रो स्टेशन बंद करने को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई स्थगित
दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशन बंद किए जाने, रेलवे सेवाओं में व्यवधान और राजधानी आने वाले लोगों को कथित तौर पर हिरासत में लेने या रास्ते में रोकने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित की।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं की प्रतियां पेश करने के लिए समय दिया।
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि मेट्रो स्टेशन बंद करने और रेलवे सेवाओं से जुड़े इसी तरह के मुद्दे पर एक अन्य जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है जिस पर गुरुवार को सुनवाई होनी है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ नेताओं सहित कई लोगों को उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया। हालांकि हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से सवाल किया कि इस मुद्दे पर वह किस तरह विचार कर सकता है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत कोई आदेश कैसे पारित कर सकता है।
इसके बाद कोर्ट ने मामले को 16 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया ताकि याचिकाकर्ता के वकील सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका की प्रतियां पेश कर सकें। बताया गया कि वहां लंबित याचिका में भी इसी तरह के मुद्दे उठाए गए।
लॉ स्टूडेंट अंशिका त्रिपाठी और एक वकील द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस और परिवहन अधिकारियों की ओर से लगाए गए प्रतिबंध जरूरत से ज्यादा व्यापक थे। याचिका के अनुसार इन प्रतिबंधों ने नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और आवागमन के मौलिक अधिकारों को प्रभावित किया।
याचिका में मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया कि 9 अक्टूबर की रात 9 बजे से अगले आदेश तक दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मध्य, उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिल्ली तक फैले इन प्रतिबंधों का दायरा जंतर-मंतर के आसपास सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं था।
याचिका में दावा किया गया कि इन कदमों से केवल प्रदर्शन में शामिल होने की योजना बना रहे लोग ही प्रभावित नहीं हुए, बल्कि रोजाना सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर आम यात्री, कर्मचारी, विद्यार्थी, मरीज और उनकी देखभाल करने वाले लोग भी प्रभावित हुए।
याचिका में 10 अक्टूबर को सुबह 4 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर रेल सेवाओं में व्यवधान की खबरों का भी उल्लेख किया गया। इसमें अधिकारियों से संबंधित ट्रेनों और रद्दीकरण के विशिष्ट नोटिस अदालत के रिकॉर्ड पर रखने की मांग की गई ताकि वास्तव में लागू किए गए प्रतिबंधों और केवल प्रस्तावित उपायों के बीच अंतर स्पष्ट हो सके।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़ी सुरक्षा चिंता अपने आप में दिल्ली के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित मेट्रो स्टेशनों तक पहुंच सीमित करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। याचिका के अनुसार, अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि प्रत्येक प्रतिबंध का पहचाने गए खतरे से क्या तार्किक संबंध था और उसके भौगोलिक दायरे, अवधि तथा व्यापकता को आवश्यक क्यों माना गया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि अन्य राज्यों से प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आ रहे लोगों को हिरासत में लिया गया या रास्ते में रोका गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी व्यक्ति के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की आशंका मात्र के आधार पर निवारक कार्रवाई नहीं की जा सकती। ऐसी कार्रवाई के लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों और प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत परिस्थितियों का आधार होना चाहिए।
याचिका में अदालत से प्रतिबंधों की न्यायिक समीक्षा करने और कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर विचार करने का आग्रह किया गया। इनमें चुनिंदा स्थानों पर प्रवेश नियंत्रण, यातायात का मार्ग बदलना, प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल और संवेदनशील स्थानों के आसपास सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं ने अन्य राहतों के साथ जंतर-मंतर और उसके आसपास शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने तथा विरोध प्रदर्शनों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित करने का निर्देश देने की मांग की।
याचिका में छात्रों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, विशेषकर महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्याचारों की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग भी की गई है। इसके अलावा, इंटरनेट तक पहुंच के मौलिक अधिकार को लेकर घोषणा करने और यदि इंटरनेट बंद किया गया हो तो उसे बहाल करने का निर्देश देने की मांग की गई।