अजीत भारती की अग्रिम जमानत पर फैसला सुरक्षित, दिल्ली हाईकोर्ट ने पूछा- पुलिस ने अब तक नोटिस क्यों नहीं दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) से जुड़े मामले में यूट्यूबर अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका पर बुधवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि FIR दर्ज होने के बावजूद अब तक भारती को नोटिस क्यों नहीं दिया गया और क्या मामले में उनकी हिरासत में पूछताछ की जरूरत है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने पुलिस से पूछा,
“नोटिस क्यों नहीं दिया गया? आपको पूछताछ के लिए हिरासत की जरूरत नहीं है?”
पुलिस की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि जांच अधिकारी को भारती का पता दो दिन पहले ही मिला है और अब वह उनसे संपर्क करने की स्थिति में है। मामले में FIR 25 अगस्त को दर्ज की गई।
कोर्ट ने इससे पहले बुधवार को उस वीडियो को भी देखा, जिसमें भारती द्वारा कथित तौर पर विवादित टिप्पणियां की गईं।
यह मामला अनुसूचित जाति के सदस्यों, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद और डॉ. भीमराव आंबेडकर के खिलाफ कथित जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणियों से जुड़ा है। भारती ने निचली अदालत द्वारा अग्रिम जमानत से इनकार किए जाने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने SC/ST Act की धारा 18 के प्रावधान पर भी विचार किया। इस धारा के तहत यदि प्रथम दृष्टया अधिनियम के तहत अपराध बनता है तो आरोपी को अग्रिम जमानत दिए जाने पर रोक लागू होती है।
भारती की ओर से वकील जय अनंत देहाद्राई ने दलील दी कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध तभी बनता है, जब जाति के आधार पर जानबूझकर किसी व्यक्ति का अपमान या उसे नीचा दिखाने का इरादा हो।
उन्होंने कहा कि भारती की टिप्पणियों को उस पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें सोशल मीडिया पर उनकी बहन के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं।
देहाद्राई ने कहा,
“मैं उस व्यक्ति के बारे में बात भी नहीं कर रहा। यह उकसावे के बाद की प्रतिक्रिया थी। मेरी बहन को सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारण के दौरान गाली दी गई। मैंने उसी का जवाब दिया। मेरी मंशा किसी की जाति को निशाना बनाना या जाति के आधार पर उसका अपमान करना नहीं थी।”
उनका तर्क था कि केवल जाति का उल्लेख अपने आप में SC/ST Act के तहत अपराध नहीं बनाता जब तक जाति के आधार पर अपमान या जानबूझकर नीचा दिखाने का इरादा न हो।
इस पर कोर्ट ने कहा कि आजाद की ओर से भारती के परिवार के बारे में कथित तौर पर कही गई बातें इस मामले में अदालत के सामने विचार का विषय नहीं हैं।
जस्टिस बनर्जी ने कहा,
“आपकी नाराजगी और शिकायत अपनी जगह है। मुझे यह देखना है कि यहां जो बयान दिया गया, उसका संदर्भ क्या था।”
दिल्ली पुलिस ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि कथित टिप्पणियां एक विशेष जाति का सीधे तौर पर अपमान करती हैं और उन्हें सार्वजनिक सोशल मीडिया मंच पर किया गया, न कि निजी बातचीत में।
शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने भी अग्रिम जमानत का विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि कथित टिप्पणियां जानबूझकर और अपमानजनक थीं तथा जब ये बातें कही गईं, उस समय करीब 23 हजार लोग ऑनलाइन थे। उन्होंने यह भी कहा कि वीडियो में बार-बार जाति का उल्लेख किया गया।
शिकायतकर्ता के वकील ने SC/ST Act की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया अपराध सामने आने पर अग्रिम जमानत की याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
इसके जवाब में भारती के वकील ने कहा कि यदि आरोपों से प्रथम दृष्टया अधिनियम के तहत अपराध ही नहीं बनता, तो धारा 18 अग्रिम जमानत के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।
इससे पहले निचली अदालत ने भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि सांसद की जाति और विवाह-योग्यता को लेकर की गई कथित टिप्पणियां प्रथम दृष्टया अधिनियम की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध का संकेत देती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि कथित टिप्पणियों में विवाह के संदर्भ में ऊंची और नीची जाति की श्रेणी का इस्तेमाल किया गया, जिससे अपमानित करने की मंशा प्रथम दृष्टया दिखाई देती है।
मामला 22 अगस्त को भारती के सत्यापित सोशल मीडिया खाते और यूट्यूब पर अपलोड किए गए उनके कार्यक्रम के एक एपिसोड से जुड़ा है। आरोप है कि इसमें अनुसूचित जाति समुदाय, चंद्रशेखर आजाद और डॉ. भीमराव आंबेडकर को लेकर जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।
मामले में SC/ST Act के प्रावधानों के अलावा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(ग) और 351(3) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत भी FIR दर्ज की गई।
दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।