NCP नेता राम अवतार जग्गी की हत्या के मामले में पूर्व CM अजीत जोगी के बेटे दोषी, हाईकोर्ट ने सुनाई आजीवन कारावास की सज़ा
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने गुरुवार (2 अप्रैल) को पूर्व विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को 2003 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता राम अवतार जग्गी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने कहा कि वह "इस साज़िश का मास्टरमाइंड, मुख्य रचयिता और इसके पीछे की मुख्य ताकत" था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी मामले का कोई पक्ष जान-बूझकर मामले को टालने की कोशिश कर रहा हो तो वह "मूक दर्शक बनकर असहाय नहीं बैठ सकता"। कोर्ट ने यह बात तब कही, जब उसने पाया कि जोगी के पास अपने मामले की तैयारी के लिए पर्याप्त समय होने के बावजूद, उसने सुनवाई टालने की मांग की और बहस शुरू करने के लिए ज़रा भी कोशिश नहीं की।
साज़िश का मास्टरमाइंड
रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और सबूतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया:
"...पूरे सबूतों से यह पूरी तरह साफ है कि अमित जोगी ही इस पूरी साज़िश का मास्टरमाइंड था और उस समय के मुख्यमंत्री का बेटा होने के नाते वह एक प्रभावशाली स्थिति में भी था। वह इतना प्रभावशाली व्यक्ति था कि वह पुलिस अधिकारियों को अपने हिसाब से इस्तेमाल करके ऐसे लोगों का इंतज़ाम कर सकता था, जो खुद को हमलावर के तौर पर पेश कर सकें। पैसों का लेन-देन, बत्रा हाउस, होटल ग्रीन पार्क और सीएम हाउस में अमित जोगी के साथ आरोपी व्यक्तियों की बार-बार हुई मुलाकातों के सबूत साफ तौर पर यह दिखाते हैं कि उसे शुरू से ही सभी गतिविधियों की जानकारी थी और यह पूरा अपराध अमित जोगी के निर्देशों के अनुसार ही रचा गया।"
कोर्ट ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री के लंबे समय से सहयोगी रहे चिमन सिंह को अमित ने एक आपराधिक साज़िश रचने के लिए बुलाया। इस साज़िश में याह्या ढेबर और अभय गोयल भी शामिल थे। इसका मकसद विधानसभा चुनावों से पहले NCP की एक रैली में बाधा डालना था। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस साज़िश का एक हिस्सा उस समय के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर ही रचा गया।
कोर्ट ने यह बात कही,
"...चिमन सिंह और दूसरे आरोपी एक बोलेरो गाड़ी में सफ़र कर रहे थे... उनके पास बांस की लाठियां और पेट्रोल से भरी बोतलें थीं, वे रायपुर के बुढ़ापारा में NCP ऑफ़िस के पास पहुंचे। मृतक जब अपनी Alto कार से उस ऑफ़िस से निकला तो आरोपियों ने उसका पीछा किया, उसे रोका और ज़बरदस्ती उसकी गाड़ी रुकवा दी। इसके बाद आरोपी अपनी-अपनी गाड़ियों से उतरे और मृतक की गाड़ी में तोड़-फोड़ की। चिमन सिंह ने मृतक पर गोली चलाई, जिससे उसकी मौत हो गई... इस घटना के बाद अमित जोगी ने आकाश चैनल के डायरेक्टर रेजिनाल्ड जेरेमिया (PW-85) को निर्देश दिया कि वे असम जाएँ और चिमन सिंह को 5,00,000 रुपये की रक़म पहुंचाएं।"
आरोपियों की 'टालमटोल की चालें'
जब मामले की सुनवाई बहस के लिए हुई तो CBI, शिकायतकर्ता और राज्य सरकार के वकीलों ने अपनी बहस पूरी कर ली थी। इसके बाद जब कोर्ट ने जोगी के वकील से उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो वकील ने फिर से कहा कि उन्हें जवाब देने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया जाए और अपील की सुनवाई टालने की फिर से गुज़ारिश की।
कोर्ट ने कहा कि पिछले वकील, जिन्हें 25 मार्च को केस की तैयारी के लिए रखा गया, उन्हें केस तैयार करने का पूरा मौक़ा दिया गया, लेकिन बाद में उन्होंने यह कहते हुए केस से अपना नाम वापस ले लिया कि उन्हें अपने क्लाइंट - अमित जोगी से कोई निर्देश नहीं मिला और "उन्हें अपना वकालतनामा दाख़िल करने से रोक दिया गया।"
इसके बाद 1 अप्रैल को एक और वकील जोगी की तरफ़ से पेश हुए और सुनवाई टालने की गुज़ारिश की। इस गुज़ारिश को नामंज़ूर कर दिया गया, लेकिन कोर्ट ने जोगी के वकील को केस तैयार करने और सही दलीलें पेश करने का मौक़ा देने के लिए मामले की सुनवाई 2 अप्रैल को तय की।
हालांकि, जब 2 अप्रैल को उन्हें बुलाया गया तो वकील ने "अपनी बहस शुरू करने की ज़रा भी कोशिश नहीं की, सिवाय इसके कि उन्हें अपना जवाब दाख़िल करने के लिए चार हफ़्ते का समय चाहिए।"
वकील साहब का यह रवैया दिखाता है कि उन्हें इन मामलों में सिर्फ़ सुनवाई टालने और इन मामलों की कार्यवाही को किसी भी तरह से रोकने के लिए ही पेश किया जा रहा है। इसके पीछे क्या वजहें हैं, यह आरोपी-प्रतिवादी नंबर 1 और उनके वकील मिस्टर वालिया ही बेहतर जानते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"यह समझना मुश्किल है कि किसी पक्ष की ओर से पेश होने वाला वकील, क्लाइंट के निर्देशों पर अचानक केस से कैसे हट सकता है। उसके बाद कोई दूसरा वकील आकर वकालतनामा दाखिल करता है। फिर से सुनवाई टालने की मांग करता है - खासकर तब, जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा वापस भेजे जाने के बाद से ही लंबित पड़ा हो।"
कोर्ट ने गौर किया कि सुनवाई टालने की मांग करते हुए एक और अर्जी (IA No. 2/2026) दाखिल की गई।
कोर्ट ने कहा,
"इस तरह का रवैया किसी गलत मकसद से केस की सुनवाई और उसकी प्रगति में जान-बूझकर देरी करने और बाधा डालने की कोशिश को दर्शाता है। किसी भी केस में किसी भी पक्ष को सुनवाई टलने का फायदा नहीं मिलना चाहिए। इन परिस्थितियों में हमें मिस्टर वालिया को कोई और मौका देने का कोई भी उचित आधार नज़र नहीं आता। इसलिए IA No. 2/2026 को खारिज किया जाता है।"
अपील स्वीकार कर ली गई और जोगी के ज़मानत बॉन्ड तीन हफ़्तों तक प्रभावी रहेंगे। इस अवधि के भीतर उसे आत्मसमर्पण करना होगा, ऐसा न करने पर उसे हिरासत में ले लिया जाएगा।
Case title: CBI v/s Amit Jogi and batch