उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को बताया, पुलिस जांच प्रणाली में सुधार के लिए कई निर्णय लिए; 2 महीने में उन्हें लागू करने का आश्वासन दिया

Update: 2022-09-06 06:12 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट


उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस जांच प्रणाली में सुधार के लिए लिए गए ‌निर्णयों की जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट को दी है। हाईकोर्ट को बताया गया है कि अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) की अध्यक्षता में 26 अगस्त, 2022 को आयोजित बैठक में सुधार संबंधी निर्णय लिए गए हैं।

सरकार ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया है कि राज्य सरकार निर्णयों दो महीने के भीतर प्रभावी ढंग से लागू करेगी, साथ ही निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक कुछ अन्य कदम भी उठाए जाएंगे।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया था कि सीआरपीसी की धारा 161 के संशोधित प्रावधानों और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 15ए की उप-धारा 10 का अक्षरसः कार्यान्वयन प्रदेश में किया जाएगा।

धारा 161 (3) सीआरपीसी के पहले और दूसरे प्रावधान के तहत ऑडियो-वीडियो माध्यम से और एक महिला अधिकारी द्वारा यौन अपराध पीड़ित महिला के बयानों की रिकॉर्डिंग अनिवार्य है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 15ए के तहत भी ऐसा ही प्रावधान है।

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने पिछले साल कहा था कि जांच अधिकारी अध‌िकांश मामलों में धारा 161 (3) सीआरपीसी के पहले और दूसरे प्रावधान का अनुपालन सही अर्थों में नहीं कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने जांच प्रणाली मजबूत करने के लिए निम्नलिखित निर्णय लिए हैं-

(i) पोस्टमॉर्टम और इंजरी की रिपोर्ट को टाइप किया जाना चाहिए और उसे सुपाठ्य बनाया जाना चाहिए। हाथ से रिपोर्ट लिखना बंद किया जाना चाहिए।

(ii) पोस्टमॉर्टम परीक्षण में डीएनए और फिंगरप्रिंट सैंपलिंग होनी चाहिए और इस कार्य के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर विकसित किया जाना चाहिए।

(iii) गोली लगने की स्थिति में, पूरे शरीर के एक्स-रे के बजाय उस स्‍थान का एक्स-रे होना चाहिए, जहां घाव लगा है। जिन मामलों में प्रवेश या निकास का घाव स्पष्ट नहीं है, एक्स-रे लेना अनिवार्य है।

(iv) पोस्टमॉर्टम परीक्षण में मृत शरीर पर लगे घावों को उजागर करने के लिए रंगीन फोटो खिंचवाने चाहिए।

(v) प्रत्येक केस डायरी के साथ एक इंडेक्स संलग्न किया जाना चाहिए, जिसे अभियोजक/माननीय जजों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। क्या सीसीटीएनएस सॉफ्टवेयर के जर‌िए आवश्यक सुविधाएं दी जा सकती हैं, यह पता लगाया जाना चाहिए।

(vi) धारा 173(2) सीआरपीसी के तहत जैसा समझाया गया है, जिस रिपोर्ट में जांच अधिकारी की राय शामिल हो, उसकी सामग्री का सारांश तैयार किया जाए। अवलोकन और संदर्भ के लिए एक इंडेक्स भी तैयार किया जाना चाहिए। यह सारांश सीआरपीसी की धारा 173(2) के तहत रिपोर्ट का एक हिस्सा है।

(vii) पर्यवेक्षी अधिकारी की भूमिका के महत्व पर बल दिया जाना चाहिए और उक्त अधिकारी को केवल डाकिया के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए। प्रत्येक जांच की सूक्ष्म तरीके से जांच की जानी चाहिए और किसी भी कमी या चूक के बारे में जांच अधिकारी को बताया जाना चाहिए। जांच अधिकारी को नियमित आधार पर प्रशिक्षण देने का भी प्रावधान किया जाए।

(viii) वरिष्ठ पर्यवेक्षी अधिकारियों को सीआरपीसी की धारा 173(2) के तहत पुलिस द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को शीघ्रता से प्रस्तुत करना चाहिए और इसे अनावश्यक रूप से अपने पास नहीं रखना चाहिए। इस संदर्भ में पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश ने पांच मई 2016 को एक पत्र पहले ही जारी किया जा है।

(ix) धारा 173 (8) के तहत आगे की जांच का आदेश देने से पहले, संबंधित विद्वान न्यायालय को अनुमति लेना/जानकारी देना वांछनीय है, लेकिन इस कदम की आवश्यकता की जांच प्रासंगिक और लागू वैधानिक प्रावधानों और माननीय सुप्रीम कोर्ट और माननीय हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णयों और टिप्पणियों के आलोक में की जानी चाहिए। सभी मामलों में जहां गवाहों के बयान ऑडियो/वीडियो मोड में दर्ज किए जाते हैं, प्रासंगिक सामग्री को कॉम्पैक्ट डिस्क/पेन ड्राइव के माध्यम से केस डायरी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

(x) केस डायरी तैयार करने के लिए उपयोग किए जाने वाले फ़ॉन्ट की साइज़ को एक प्वाइंट बढ़ाया जाए, जिससे इसे सुपाठ्य बनाया जा सके। इस उद्देश्य के लिए सीसीटीएनएस पर अपलोड किए गए रिकॉर्ड में फ़ॉन्ट साइज़ को बढ़ाने के लिए एनआईसी का सहयोग मांगा गया है।

(xi) आईपीसी की धारा 65बी में निहित वैधानिक प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए और जांच अधिकारी को इन मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाए।

(xii) इस बात पर जोर दिया गया है कि पर्यवेक्षी अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए उचित निर्देश दिए जाएं कि वे अपना कर्तव्य कुशलतापूर्वक और लगन से अनुपालन करें। अपर पुलिस महानिदेशक (अपराध) ने बताया है कि सभी जिलों में अर्दली कक्षों में और क्राइम मीटिंग द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अपर मुख्य सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश सरकार, ने निर्देश जारी किया है कि उन जांच अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाए, जिन्होंने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही बरती है। निष्पक्ष और उचित जांच को प्रभावित किया है।

(xiii) प्रत्येक जिले में, संयुक्त निदेशक (अभियोजन) को कानूनी प्रकोष्ठ का नेतृत्व करना चाहिए, जिसका निर्माण इस मकसद से किया जाए कि सभी जांच अधिकारियों को आपराधिक कानून में नवीनतम संशोधनों और माननीय सुप्रीम कोर्ट और माननीय हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णयों के संबंध में प्रशिक्षित किया जा सके।

इसके अलावा, राज्य सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि वह जांच अधिकारियों को पहले ही निर्देश जारी कर चुकी है कि महिलाओं के खिलाफ जिन मामलों में पीड़िता का बयान सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज किया गया है और धारा 161 और 164 सीआरपीसी के तहत पीड़ित के बयानों में भिन्नता होने की स्थिति में, जांच अधिकारी पीड़ित के पूरक बयान (मजीद बयान) में कोई सवाल नहीं उठाएगा, जो धारा 164 सीआरपीसी के तहत पीड़िता के बयान को निराश करता और नकारता हो।

यूपी सरकार द्वारा लिए गए उपरोक्त निर्णयों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस संजय कुमार सिंह की पीठ ने कहा कि भारत में आपराधिक न्याय प्रशासन प्रणाली मानव अधिकारों और मानव की गरिमा को बहुत ऊंचे स्थान पर रखती है। हमारे न्यायशास्त्र में एक आरोपी को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है और इस प्रकार, एक आरोपी निष्पक्ष जांच और निष्पक्ष सुनवाई का हकदार है, और अभियोजन पक्ष से मुकदमे में संतुलित भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है।

बैकग्राउंड

उल्लेखनीय है कि कोर्ट 2009 के अधिनियम 5, 2013 के अधिनियम 13 और 2018 के अधिनियम 22 द्वारा धारा 161 सीआरपीसी में संशोधन के मद्देनजर गवाहों की आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत बयान दर्ज करने के माध्यम और तरीके से संबंधित कई मामलों और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 15ए की उप धारा (10) के प्रावधानों के अनुपालन और निष्पक्ष जांच को सुव्यवस्थित करने के लिए उठाए गए कदमों पर सुनवाई कर रही थी।

अदालत ने जांच प्रणाली में सुधार सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदमों पर विचार-विमर्श के लिए अधिकारियों की एक बैठक का निर्देश दिया था।

केस टाइटल- वसीम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य, जुड़े मामलों के साथ


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