इज़राइल-फिलिस्तीन में राज्य और गैर-राज्य पक्षों द्वारा की गई हिंसा होगी UN जांच आयोग का प्रमुख फोकस

Update: 2026-01-23 08:58 GMT

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अधीन गठित स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग (Independent International Commission of Inquiry), जो कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों (पूर्वी यरुशलम सहित) और इज़राइल में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए गठित किया गया है, के नव-नियुक्त सदस्यों ने जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान आयोग ने अपनी प्राथमिकताओं को रेखांकित किया और जवाबदेही, सहयोग तथा हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर सवालों के जवाब दिए।

इस आयोग की अध्यक्षता भारत के पूर्व हाईकोर्ट चीफ़ जस्टिस श्रीनिवासन मुरलीधर कर रहे हैं। आयोग के अन्य सदस्यों में फ्लोरेंस मुंबा (ज़ाम्बिया के सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश और यूगोस्लाविया व कंबोडिया पर गठित अंतरराष्ट्रीय आयोगों की पूर्व सदस्य) तथा क्रिस सिडोटी (ऑस्ट्रेलियाई बैरिस्टर) शामिल हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत करते हुए जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि आयोग का दायित्व कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों, पूर्वी यरुशलम और इज़राइल में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सभी कथित उल्लंघनों की जांच करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह जांच सभी कर्तव्यधारकों पर लागू होगी, चाहे वे राज्य हों या गैर-राज्य पक्ष।

उन्होंने आयोग को एक स्वतंत्र और जन-केंद्रित संस्था बताया, जो संघर्ष से प्रभावित दोनों पक्षों—फ़िलिस्तीनियों और इज़राइलियों—की बात को गंभीरता से सुनने का इरादा रखती है।

आयोग की तत्काल प्राथमिकताओं पर बोलते हुए न्यायमूर्ति मुरलीधर ने कहा कि राज्य और गैर-राज्य दोनों पक्षों द्वारा की गई शारीरिक हिंसा जांच का मुख्य केंद्र होगी। इसमें फ़िलिस्तीनी सशस्त्र गुटों द्वारा किए गए हमले भी शामिल होंगे। इसके अलावा, आयोग बच्चों, पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के खिलाफ उल्लंघनों तथा संघर्षविराम के दौरान हुई घटनाओं की भी जांच करेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित “बोर्ड ऑफ पीस” पहल पर पूछे गए सवाल के जवाब में मुरलीधर ने कहा कि आयोग को इसमें और संयुक्त राष्ट्र की जवाबदेही व्यवस्था में कोई टकराव नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि आयोग का कार्य मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच करना है और वह अपने संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रदत्त जनादेश के अनुसार काम करता रहेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी शांति पहल में संघर्ष क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों के हितों को शामिल किया जाना चाहिए और ऐसी कोई बात नहीं है जो आयोग के काम में बाधा डाले। साथ ही, उन्होंने दोनों पक्षों से पूर्ण सहयोग की अपेक्षा जताई।

जस्टिस मुरलीधर ने बताया कि अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपने पहले कदमों में इज़राइली अधिकारियों को पत्र लिखकर आयोग के साथ सहयोग का अनुरोध किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ज़मीनी हालात में हालिया बदलाव अधिक सकारात्मक सहयोग की ओर ले जाएंगे।

वित्तीय संसाधनों की कमी पर बोलते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि सीमित संसाधनों के कारण पहले हथियारों की आपूर्ति और सेटलर हिंसा जैसे मुद्दों की गहन जांच संभव नहीं हो पाई थी। उन्होंने इसे संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में व्यापक संसाधन संकट का हिस्सा बताया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोग एक जांच निकाय है, न कि न्यायिक संस्था। हालांकि, इसकी निष्कर्ष रिपोर्टें भविष्य में किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक मंच पर साक्ष्य के रूप में उपयोग की जा सकती हैं, क्योंकि आयोग अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों के अनुरूप कड़े साक्ष्य मानकों का पालन करता है।

प्रेस वार्ता में संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए। इस पर आयोग के सदस्य क्रिस सिडोटी ने कहा कि दशकों से UNRWA उन बुनियादी दायित्वों को निभा रही है, जो चौथे जिनेवा कन्वेंशन के तहत इज़राइल पर एक कब्ज़ा शक्ति के रूप में लागू होते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि इज़राइल UNRWA को समाप्त करता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं की ज़िम्मेदारी सीधे इज़राइल सरकार और उसके करदाताओं पर आएगी, जिसकी लागत अरबों में होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि UNRWA के कार्यों को नज़रअंदाज़ करने से गंभीर मानवीय परिणाम होंगे।

जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि UNRWA की इमारतों को गिराने जैसे कदमों को एजेंसी के जनादेश की समाप्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भवन का ध्वस्तीकरण UNRWA के कार्य या अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसकी ज़िम्मेदारियों को समाप्त नहीं कर सकता।

आयोग की सदस्य जस्टिस फ्लोरेंस मुंबा ने पत्रकारों की हत्याओं पर गहरी चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसे कृत्य अक्सर गलत कामों को छिपाने के प्रयास को दर्शाते हैं। उन्होंने मीडिया कर्मियों से अपील की कि वे रिपोर्टिंग से पीछे न हटें।

समापन वक्तव्य में जस्टिस मुरलीधर ने प्रभावित समुदायों को आश्वस्त किया कि आयोग कठोर गवाह संरक्षण नियमों और “कोई नुकसान न पहुँचाने” के सिद्धांत का पालन करता है। उन्होंने कहा कि आयोग का कार्य कानून के शासन में विश्वास और न्याय की तलाश कर रहे लोगों के लिए आशा का स्रोत है।

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