त्रिपुरा हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार के खिलाफ कथित तौर पर भड़काऊ राजनीतिक भाषण देने के मामले में दर्ज FIR रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों की और जांच की ज़रूरत है।

कोर्ट ने कहा कि यह पता लगाने के लिए जांच ज़रूरी है कि क्या कथित बयानों से भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 192, 353(1)(b) और 61(1) के तहत अपराध बनते हैं या नहीं।

जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ और जस्टिस बिस्वजीत पालित की डिवीज़न बेंच ने कहा:

"पूरी चर्चा और माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए यह कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि FIR रद्द करने की यह याचिका सफल नहीं हो सकती और इसे खारिज किया जाना चाहिए। इस मामले में बारीकी से जांच की ज़रूरत है।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 16 अगस्त, 2026 को वेस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन में त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 192, 353(1)(b) और 61(1) के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है।

यह FIR शिकायत के आधार पर दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि सरकार ने 10 अगस्त, 2026 को अगरतला में एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान भड़काऊ बयान दिया, जिसमें देश और राज्य से "उग्र/आक्रामक आंदोलन" का रास्ता अपनाने का आह्वान किया गया। सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत त्रिपुरा हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि उनके बयानों का गलत मतलब निकाला गया और FIR राजनीतिक कारणों से प्रेरित है और इसमें कथित अपराधों के ज़रूरी तत्व नहीं हैं।

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि शुरुआती चरण में FIR रद्द नहीं की जा सकती, क्योंकि आरोपों से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध (Cognizable Offences) बनते दिखते हैं, जिनकी जांच ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा कि तनावपूर्ण कानून-व्यवस्था की स्थिति के बीच बड़ी भीड़ के सामने सरकार द्वारा दिए गए कथित बयानों के अर्थ और संदर्भ की जांच सबूतों और गवाहों के बयानों के ज़रिए की जानी चाहिए।

कोर्ट ने आगे कहा कि असल में दंगा न होने का मतलब यह नहीं है कि BNS की धारा 192 लागू नहीं होगी; यह धारा ऐसे जानबूझकर उकसाने वाले कामों पर भी लागू होती है जिनसे दंगा नहीं होता।

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है, कोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और सरकार को भविष्य में भड़काऊ या नफ़रत फैलाने वाले भाषण न देने का निर्देश दिया।

Case Title : Shri Manik Sharma v/s The State of Tripura

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