PM Modi पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में अगरतला मेयर को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार किया

Update: 2026-08-13 07:08 GMT

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अगरतला के मेयर के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां करने के मामले में कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास के खिलाफ दर्ज दो FIR रद्द करने से इनकार किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया उनकी टिप्पणियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग जैसी प्रतीत होती हैं और मामले में आगे की जांच की आवश्यकता है।

जस्टिस डॉ. टी. अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ की खंडपीठ ने कहा कि जांच अधिकारी ने बिस्वास का मोबाइल फोन जब्त कर सामग्री एकत्र की है लेकिन कथित वीडियो अभी तक बरामद नहीं हो सके हैं। जांच अधिकारी ने संबंधित वीडियो बाद में अदालत के समक्ष पेश करने के लिए समय मांगा है। ऐसे में जांच को पूरा नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

“याचिकाकर्ता की टिप्पणियां प्रथम दृष्टया मोबाइल के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मिली स्वतंत्रता के दुरुपयोग जैसी प्रतीत होती हैं।”

अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। इसके माध्यम से लोग संवाद करते हैं, सूचनाएं साझा करते हैं और एक-दूसरे से जुड़ते हैं, लेकिन इसी माध्यम से गलत जानकारी भी तेजी से फैल सकती है और कम समय में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में लोग विभिन्न मुद्दों पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं लेकिन इसी मंच का इस्तेमाल ऑनलाइन मानहानि के लिए भी किया जा रहा है।

FIR में लगाए गए आरोपों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि बिस्वास ने प्रधानमंत्री और राज्य के मेयर के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। आरोप है कि उनके नाम और उपनाम का मजाक उड़ाया गया तथा कुछ टिप्पणियों से माता त्रिपुरेश्वरी की पूजा करने वाले लोगों की भावनाएं भी आहत हुईं।

अदालत ने कहा कि ऐसे कथनों से किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है तो वे मानहानि के दायरे में आ सकते हैं और शिकायतकर्ताओं को मानहानि की कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है लेकिन यह सोशल मीडिया पर मानहानिकारक, अपमानजनक या दुर्भावनापूर्ण सामग्री प्रकाशित करने का संरक्षण नहीं देती। अदालत ने कहा कि झूठे दावे करना, दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाना या बिना सत्यापन के आरोप साझा करना दीवानी क्षतिपूर्ति के मुकदमे या आपराधिक कार्रवाई का आधार बन सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि किसी कथन को मानहानिकारक मानने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसे दूसरों ने किस अर्थ में समझा और उसका क्या प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव का आकलन उस व्यक्ति की गवाही से किया जा सकता है जिसने कथित बयान या पोस्ट को सुना या पढ़ा हो।

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