RSS और एमएस गोलवलकर को कथित तौर पर बदनाम करने के लिए दायर मानहानि मामले के खिलाफ़ दिग्विजय सिंह की याचिका खारिज
ठाणे कोर्ट ने हाल ही में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह द्वारा दायर आवेदन खारिज किया, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके संस्थापक एमएस गोलवलकर को ट्विटर (अब X) पर आपत्तिजनक पोस्ट करके कथित तौर पर बदनाम करने के लिए अपने खिलाफ दायर मानहानि के मुकदमे को खारिज करने की मांग की थी।
बता दें, RSS कार्यकर्ता विवेक चंपानेरकर ने सिंह के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया और नेता के खिलाफ RSS के खिलाफ कोई भी बयान देने पर स्थायी रोक लगाने की मांग की थी। उन्होंने सितंबर, 2023 में ट्विटर पर सिंह की पोस्ट से हुए नुकसान के लिए 1 रुपये के मुआवजे की भी मांग की, जिसमें सांसद ने ट्वीट किया, "गुरु गोलवलकर जी के दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए और राष्ट्रीय जल, जंगल और जमीन पर अधिकार पर क्या विचार थे, अवश्य जानिए।"
कैप्शन के अलावा, सिंह ने कथित तौर पर गोलवलकर की एक फोटो पोस्ट की, जिसमें लिखा था,
"मैं सारी ज़िंदगी अंग्रेजों की गुलामी करने के लिए तैयार हूं लेकिन जो दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को बराबरी का अधिकार देती हो, ऐसी आज़ादी मुझे नहीं चाहिए।"
इस पोस्ट पर आपत्ति जताते हुए चंपानेरकर ने तर्क दिया कि गोलवलकर को यह बात कहना गलत और फर्जी है और RSS के संस्थापक ने ऐसे शब्द कभी नहीं कहे थे।
23 जनवरी को सिविल जज राजेश खांडारे ने सिंह की याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने दावा किया कि वादी चंपानेरकर, जिसने खुद को RSS का 'स्वयंसेवक' बताया, उसके पास मानहानि का मुकदमा दायर करने का कोई अधिकार नहीं है। सीनियर कांग्रेस नेता ने यह भी बताया कि मुकदमा 'कम मूल्य का' था और भुगतान की गई कोर्ट फीस भी 'अपर्याप्त' थी। जज ने शिकायत का ज़िक्र किया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि "यह मुकदमा दायर करने का कारण 8 जुलाई, 2023 को तब पैदा हुआ, जब सिंह ने RSS के खिलाफ 'झूठे, बेबुनियाद, आधारहीन और मानहानिकारक आरोप' पोस्ट किए।"
जज खांडारे ने कहा,
"इसलिए मुकदमे का कारण बनता है।"
इसके अलावा, संगठन की ओर से मुकदमा दायर करने के लिए वादी के पास लोकस स्टैंडी न होने के सिंह के तर्क को खारिज करते हुए जज ने 10 मार्च, 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट के राहुल गांधी बनाम राजेश महादेव कुंठे मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया कि "इसमें कोई विवाद नहीं है कि RSS एक निश्चित संस्था है। यह IPC की धारा 499 के स्पष्टीकरण 2 के तहत आएगी। इसलिए RSS का कोई भी पीड़ित सदस्य पीड़ित व्यक्ति माना जाएगा और वह ऐसे व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकता है, जो RSS की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना चाहता है।"
इन टिप्पणियों पर भरोसा करते हुए जज ने सिंह के इस तर्क को खारिज कर दिया कि RSS रजिस्टर्ड संस्था नहीं है। इसलिए एक कानूनी व्यक्ति नहीं है और कानूनी चरित्र और इकाई की अनुपस्थिति में न तो ऐसी गैर-पंजीकृत संस्था अपने नाम से मुकदमा कर सकती है या उस पर मुकदमा किया जा सकता है और न ही किसी को सिविल मुकदमा दायर करने के लिए अधिकृत कर सकती है।
जहां तक सिंह के इस तर्क की बात है कि मुकदमा 'कम मूल्यांकन' वाला है और भुगतान की गई फीस 'अपर्याप्त' है, जज ने कहा,
"यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि प्रतिवादी ने यह नहीं बताया कि मुकदमा कम मूल्यांकन वाला कैसे है और कितनी कोर्ट फीस पर्याप्त है? यह एक स्थापित कानून है कि भले ही मुकदमे का मूल्यांकन कम किया गया हो या कोर्ट फीस अपर्याप्त हो, लेकिन इस आधार पर वादी को इसे ठीक करने का अवसर दिए बिना शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता। उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए आवेदन खारिज किए जाने योग्य है।"
इन टिप्पणियों के साथ जज ने सिंह द्वारा दायर आवेदन खारिज किया।
Case Title: Vivek Champanerkar vs Digvijay Singh