POCSO मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ अवमानना याचिका से अलग हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल

Update: 2026-05-07 10:18 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ दायर अवमानना याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग की।

बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अग्रवाल ने निर्देश दिया कि चीफ जस्टिस से नामांकन प्राप्त करने के बाद इस मामले को नई याचिका के रूप में किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

यह अवमानना याचिका आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज की ओर से दायर की गई। याचिका में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई।

दोनों धार्मिक नेताओं पर नाबालिगों के साथ भेदन संबंधी यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप हैं और उनके खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज है।

याचिका में आरोप लगाया गया कि दोनों आरोपित हाइकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत देते समय लगाई गई शर्तों का जानबूझकर उल्लंघन कर रहे हैं। अदालत ने 27 फरवरी को अंतरिम आदेश और 25 मार्च को अंतिम आदेश पारित करते हुए उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया था।

आशुतोष महाराज FIR में प्रथम सूचनाकर्ता भी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बावजूद आरोपित नाबालिग पीड़ितों के गृह जिलों में बिना अनुमति सार्वजनिक रैलियां और सभाएं कर रहे हैं।

याचिका के अनुसार इन सभाओं और मीडिया बयानों के जरिए पीड़ितों और उनके परिवारों को डराने, समाज में भय का माहौल बनाने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

याचिका में कहा गया कि धार्मिक यात्राओं और सभाओं के दौरान आरोपित विभिन्न समाचार चैनलों और सोशल मीडिया मंचों पर भड़काऊ और भ्रामक बयान दे रहे हैं। इनमें यह दावा भी किया जा रहा है कि उनके खिलाफ मामले सरकार के इशारे पर दर्ज किए गए।

आशुतोष महाराज ने कहा कि ऐसे बयान समाज में भ्रम फैलाने अदालत की निष्पक्षता पर संदेह पैदा करने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से दिए जा रहे हैं, जो अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है।

याचिका में यह भी दावा किया गया कि प्रथम सूचनाकर्ता की नाक काटने पर 21 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया। इसके बाद 8 मार्च 2026 को चलती ट्रेन में उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें उन्हें चोटें आईं।

इसके अलावा याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उन्हें पाकिस्तान के एक मोबाइल नंबर से व्हाट्सऐप कॉल कर जान से मारने की धमकी दी गई। कॉल करने वाले ने कहा कि यदि मामले वापस नहीं लिए गए तो उन्हें और उनके वकील को बम विस्फोट में मार दिया जाएगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि लगातार मिल रही धमकियां और हिंसक घटनाएं न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप हैं।

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