तमिलनाडु में 11 विधायकों की अयोग्यता पर सुप्रीम कोर्ट ने DMK की याचिका पर नोटिस जारी किया

Update: 2020-07-08 10:34 GMT

Supreme Court of India

सुप्रीम कोर्ट ने DMK नेता आर सक्करापानी द्वारा दायर याचिका में नोटिस जारी किया है, जिसमें तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे 2017 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी के खिलाफ मतदान करने वाले 11 विधायकों की अयोग्यता याचिका पर तुरंत फैसला करें। 

याचिका पर भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने नोटिस जारी किया। हालांकि, उन्होंने दलीलें सुनने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को सूचित किया कि जब 4 सप्ताह में इस मामले को सुना जाएगा, तब बहस सुनी जाएगी।

सिब्बल ने कोर्ट के संज्ञान में लाया कि विधानसभा का कार्यकाल मई 2021 में समाप्त होगा और इसलिए, जल्द तारीख की मांग की गई। हालांकि, सीजेआई बोबडे ने उसका जवाब देते हुए कहा कि मई 2021 बहुत दूर है।

वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने नोटिस जारी करने के खिलाफ बहस करने का प्रयास किया। हालांकि, सीजेआई ने उन्हें ऐसा करने से रोका और दोनों वकीलों को सूचित किया कि जब मामला सुना जाएगा तो बहस करें।

18 फरवरी, 2017 को, 11 विधायकों ने अपनी ही पार्टी, यानी AIADMK के विश्वास मत के खिलाफ मतदान किया था। ये विधायक AIADMK के ओ पनीरसेल्वम गुट के हैं।

इस कार्रवाई को पार्टी द्वारा स्वीकार नहीं किया गया और तदनुसार, इन 11 विधायकों की अयोग्यता की मांग के लिए, संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के तहत स्पीकर के समक्ष अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की गईं। इसके बाद, ओ पनीरसेल्वम और ई पलानीस्वामी के धड़ों का विलय हो गया।

इन घटनाक्रमों के मद्देनजर, स्पीकर ने अयोग्यता की मांग वाले आवेदनों को लंबित रखा। स्पीकर को कार्रवाई करने का निर्देश देने के लिए, शीर्ष अदालत के समक्ष फरवरी 2020 में एक याचिका दायर की गई थी, जिसका 14 फरवरी को निस्तारण किया गया था, जिसमें स्पीकर को कानून के अनुसार अयोग्यता याचिकाएं तय करने के लिए कहा गया था।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के बावजूद, विधानसभा में डीएमके के मुख्य सचेतक आर सक्करापानी की ओर से वकील अमित आनंद तिवारी ने याचिका दायर करते हुए कहा कि पिछले 4 महीनों से कुछ नहीं किया गया है। आगे कहा गया है कि केशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष मणिपुर विधान सभा (2020) के मामले में फैसले के अनुसार अयोग्यता याचिकाओं के संबंध में लिए जाने वाले निर्णय के लिए तीन महीने की एक बाहरी सीमा है।

याचिका में कहा गया है कि स्पीकर की निष्क्रियता "अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 164 (1 बी), अनुच्छेद 191 और भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची की मनमानी और उल्लंघन है और इस माननीय अदालत के निर्णय के खिलाफ भी है।"

अयोग्य ठहराए जाने वाली याचिका को तय करने की दिशा में स्पीकर द्वारा एक कदम भी ना बढ़ाया जाना "केवल अक्षर ही नहीं, बल्कि इस माननीय न्यायालय के आदेश की भावना" के विपरीत है।

दलीलों राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007) के मामले को संदर्भित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि जहां लोगों ने दलबदल का कार्य किया है, "एक दिन के लिए भी विधानसभा में उनकी मौजूदगी गैरकानूनी और असंवैधानिक होगी। कम से कम मंत्री के पद ग्रहण करने की तारीख के छह महीने की समाप्ति के बाद मंत्रियों के रूप में उनका पद भी अवैध होगा।"

दलीलों में कहा गया है कि, इस मामले में, यह स्पष्ट है कि उत्तरदाताओं ने अयोग्यता का कार्य किया है, और इसलिए,वो विधान सभा के सदस्यों के रूप में जारी रहने के हकदार नहीं हैं।

याचिका में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसा करने का आदेश दिए जाने के बावजूद स्पीकर जानबूझकर निर्णय से बच रहे हैं, जो अपने संवैधानिक कर्तव्य से बचना है।

"लगभग तीन वर्षों के लिए स्पीकर की निष्क्रियता का पूरा उद्देश्य यह देखना है कि विधानसभा की पूरी अवधि बीतने तक कार्यवाही नहीं की जाए, ताकि अयोग्य ठहराए जाने की याचिका को निष्प्रभावी बना दिया जाए।"

उपरोक्त के प्रकाश में, और जब तक कि तब तक यह मामला तय होगा, विधानसभा का पूरा कार्यकाल समाप्त हो जाएगा, याचिकाकर्ता का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट आने के लिए विवश है। मामला अब 4 सप्ताह के बाद सूचीबद्ध किया गया है।

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