सावरकर ने अगर अंग्रेजों से समझौता किया होता तो वह भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते: पुणे कोर्ट में बोले उनके पोते
पुणे की स्पेशल MP/MLA कोर्ट में अपनी गवाही जारी रखते हुए सत्यकी सावरकर ने मंगलवार को कहा कि अगर उनके दादाजी (ग्रैंड-अंकल) और दक्षिणपंथी विचारक विनायक सावरकर ने उस समय के ब्रिटिश शासन का साथ दिया होता तो उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनाया जा सकता था।
सत्यकी से उस आपराधिक मानहानि मामले में क्रॉस-एग्जामिनेशन की जा रही है जो उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ लंदन में भाषण देकर सावरकर की कथित तौर पर बदनामी करने के लिए दायर किया।
गांधी के वकील मिलिंद पवार स्पेशल जज अमोल शिंदे के सामने सत्यकी से क्रॉस-एग्जामिनेशन कर रहे हैं।
मंगलवार (14 जुलाई) को सत्यकी ने कोर्ट को बताया कि अगर उनके दादाजी ने ब्रिटिश शासन का साथ दिया होता या अपनी मान्यताओं से समझौता किया होता, तो अंग्रेज उन्हें 1946 में देश का प्रधानमंत्री बनाकर पुरस्कृत करते।
सत्यकी ने कोर्ट से कहा,
"अगर सावरकर ने 1946 में अंग्रेजों से समझौता किया होता तो उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनाया जाता; यह मेरी निजी राय है। यह कहना सही नहीं है कि मेरे पास इस निजी राय का समर्थन करने के लिए कोई ऐतिहासिक दस्तावेजी सबूत नहीं है। सावरकर ने अंग्रेजों से बिल्कुल भी समझौता नहीं किया था; इसके बजाय, ब्रिटिश सरकार ने उनकी सभी ज़मीन और रिहायशी संपत्तियां ज़ब्त कर ली थीं। उन्होंने उनकी बैरिस्टर की डिग्री भी रद्द कर दी थी। उन्हें 27 साल की जेल और नज़रबंदी की सज़ा सुनाई गई। इसका मतलब है कि वह ब्रिटिश एजेंट नहीं थे। वह अंग्रेजों के करीबी नहीं थे।"
सत्यकी ने कहा कि कोई भी शासक अपने करीबी व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद देता है। साथ ही दावा किया कि आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ब्रिटिश सरकार के पक्ष में काम किया था।
सत्यकी ने दावा किया,
"जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, 'हिटलर और जापान भाड़ में जाएं। मैं उनसे आखिर तक लड़ूंगा और यही मेरी नीति है। अगर सुभाष चंद्र बोस जापान के साथ भारत आते हैं तो मैं उनसे और उनकी पार्टी से भी लड़ूंगा। बोस ने भले ही अच्छी नीयत से काम किया हो, लेकिन उनका काम बहुत गलत था।' इससे साबित होता है कि नेहरू सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के पक्ष में नीतियां लागू की थीं।"
खास बात यह है कि सत्यकी ने यह भी कहा कि उन्होंने अब तक जो भी बयान दिया है, उसमें उन्होंने सिर्फ़ वकील पवार के पूछे गए मुद्दों पर अपनी राय रखी है। उनके वकील ने भी पवार के सवालों पर आपत्ति जताई और कहा कि उनके मुवक्किल (सत्यकी) से 'बेमतलब के सवाल' पूछे जा रहे हैं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि सभी आपत्तियों पर अंतिम सुनवाई के समय विचार किया जाएगा।
इसके अलावा, सत्यकी ने दावा किया कि ऐसा कोई 'पुख्ता सबूत' नहीं है जिससे यह पता चले कि ब्रिटिश सरकार ने सावरकर को हर महीने 'गुज़ारा भत्ता' (sustenance allowance) दिया था। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि महात्मा गांधी ने ज़रूर अंग्रेज़ों से ऐसा मासिक भत्ता पाने के लिए पत्र लिखे थे। हालांकि बाद में उन्होंने माना कि उन्होंने ऐसा कोई पत्र रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया।
गांधीजी द्वारा मासिक भत्ता मांगने के सत्यकी के दावे का जवाब देने के लिए पवार ने दो पत्र रिकॉर्ड पर पेश किए - एक पत्र जून 1930 में बॉम्बे सरकार के गृह विभाग के सचिव ने भारत सरकार के गृह विभाग के सचिव को लिखा था, जिसमें गांधीजी को गुज़ारे के लिए 100 रुपये का भत्ता देने के ब्रिटिश सरकार के फ़ैसले का ज़िक्र था।
इसके अलावा एक और पत्र रिकॉर्ड पर पेश किया गया - यह पत्र मई 1930 में खुद गांधीजी ने लिखा था, जिसमें उन्होंने उन्हें 100 रुपये का मासिक भत्ता देने के ब्रिटिश सरकार के फ़ैसले का विरोध किया। इस पत्र में गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया था कि वे उन्हें कोई भत्ता न दें। इसके बजाय उन्हें केवल कुछ अख़बार और उनका रोज़ का खाना उपलब्ध कराएं।
अपने बयान में सत्यकी ने आगे कहा,
"कई क्रांतिकारियों ने सावरकर की तारीफ़ में बातें कही हैं, जिनमें मैडम कामा, शहीद भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रमुख हैं। आज़ादी के बाद भी इंदिरा गांधी, यशवंतराव चव्हाण और शरद पवार ने उनके बारे में तारीफ़ भरी बातें कही हैं। मुझे नहीं पता कि सावरकर को लेकर इतिहासकारों के बीच विचारों में मतभेद हैं।"
इस मामले में आगे की क्रॉस-एग्जामिनेशन 30 जुलाई को होगी।
Case Title: Satyaki Savarkar vs Rahul Gandhi