बची हुई बिक्री की रकम न चुकाना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी एग्रीमेंट के तहत बिक्री की बची हुई रकम न चुकाना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता, जब तक कि वादा करते समय बेईमानी या धोखाधड़ी का इरादा न रहा हो।
जस्टिस आलोक कुमार पांडे की सिंगल जज बेंच ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि कोई पार्टी बाद में अपना वादा पूरा नहीं कर पाई, ऐसा इरादा नहीं माना जा सकता।
यह मामला ज़मीन के एक सौदे से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने ज़मीन खरीदने के लिए आरोपी के साथ एक एग्रीमेंट किया। शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने बाद में पूरी ज़मीन अपने नाम रजिस्टर कराने की मांग की और उसी दर पर अतिरिक्त ज़मीन के लिए भुगतान करने पर सहमति जताई।
इसके बाद ज़मीन आरोपी के नाम रजिस्टर कर दी गई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि सौदे के लिए ₹1.80 करोड़ का भुगतान तो किया गया, लेकिन बार-बार मांगने के बावजूद ₹90.20 लाख की बची हुई रकम का भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 और 420 के तहत आपराधिक विश्वासघात और धोखाधड़ी जैसे अपराधों का आरोप लगाते हुए एक आपराधिक शिकायत दर्ज की गई।
ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 203 के तहत शिकायत खारिज की। रिविजनल कोर्ट ने इस आदेश को सही ठहराया और विवाद को एग्रीमेंट के तहत पैसे के दावे से जुड़ा मामला माना। हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आरोपी ने इस भरोसे पर ज़मीन का रजिस्ट्रेशन कराया कि पूरी रकम का भुगतान किया जाएगा, लेकिन बाद में बकाया रकम का भुगतान नहीं किया। यह तर्क दिया गया कि उनका आचरण धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के बराबर था।
हाईकोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के अपराध के लिए सौदे की शुरुआत में ही बेईमानी का इरादा होना ज़रूरी है। बाद में वादा पूरा न कर पाना ऐसे इरादे को मानने के लिए काफ़ी नहीं है।
कोर्ट ने कहा:
“किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी का दोषी ठहराने के लिए यह दिखाना ज़रूरी है कि वादा करते समय उसका इरादा धोखाधड़ी वाला या बेईमानी भरा था। बाद में वादा पूरा न कर पाने से यह नहीं माना जा सकता कि शुरू से ही उसका इरादा वादा तोड़ने का था।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि आपराधिक शिकायत असल में पार्टियों के बीच हुए एग्रीमेंट को लागू करवाने के लिए दर्ज की गई। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए ज़रूरी बुनियादी तत्व मौजूद नहीं थे। इसके अनुसार, हाई कोर्ट ने आपराधिक शिकायत को खारिज करने वाले आदेशों में दखल देने से इनकार किया।
Case Title: Yogesh Kumar Singh v. State of Bihar and Ors.
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