NALSAR स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ BCI के आदेशों की 400 पूर्व छात्रों ने की निंदा
नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (NALSAR) के 441 पूर्व छात्रों ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को खुला पत्र लिखा। यह पत्र BCI द्वारा जारी उन निर्देशों के विरोध में है (जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया था) जिनमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के कारण NALSAR यूनिवर्सिटी के छात्रों के एनरोलमेंट (पंजीकरण) को रोकने की बात कही गई थी।
पत्र में कहा गया कि भले ही "एनरोलमेंट पर रोक और जांच की मांग" और रिपोर्ट को "जनता के दबाव" के कारण जल्द ही वापस ले लिया गया, लेकिन पूर्व छात्र यह पत्र इसलिए लिख रहे हैं ताकि "जिस तरह से आपने (मिश्रा) भारत में छात्रों, फैकल्टी और यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता के मुद्दे को देखा है, उसकी निंदा की जा सके"।
पूर्व छात्रों ने कहा,
"ये पत्र छात्रों और उनके मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सहानुभूति की कमी, बोलने की आज़ादी के मौलिक अधिकार की अनदेखी और युवा छात्रों व पढ़े-लिखे फैकल्टी के मामलों से मनमाने और कठोर तरीके से निपटने की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। यह स्पष्ट है कि BCI के पास ये पत्र जारी करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। और भी चिंताजनक बात यह है कि पहले पत्र की भाषा छात्रों और फैकल्टी पर दबाव डालने वाली धमकियों के ज़रिए हावी होने की प्रवृत्ति को दिखाती है, जो यूनिवर्सिटी कैंपस में बोलने की आज़ादी को सीमित करती है और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी दबाव डालती है।"
पत्र में कहा गया कि "यूनिवर्सिटी कैंपस में बोलने की आज़ादी" के मामलों को रेगुलेट करने में BCI की कोई भूमिका नहीं है और कानूनी शिक्षा में इसकी भूमिका केवल कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने और ऐसी शिक्षा के मानक तय करने तक सीमित है।
इसके अलावा, पूर्व छात्रों ने कहा कि BCI को छात्रों और फैकल्टी के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक जांच शुरू करने या उन पर जुर्माना लगाने की कोई शक्ति नहीं दी गई, वह भी बिना किसी नोटिस या सुनवाई के।
"पहले पत्र की भाषा न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि यह छात्रों और फैकल्टी को बदनाम भी करती है। इसमें आरोप लगाया गया कि वे 'गुटबाज़ी', 'गंदी राजनीति', 'घिनौनी राजनीति' और 'छात्रों को उकसाने और गुमराह करने' जैसे कामों में शामिल हैं।"
कानूनी पेशे और कानूनी शिक्षा के प्रति ज़िम्मेदार एक वैधानिक संस्था के लिए ऐसी गैर-ज़िम्मेदाराना बातें शोभा नहीं देतीं। पत्र में उन लोगों की पहचान करने और उनकी रिपोर्ट करने को कहा गया, 'जो मुख्य रूप से इस अभियान या प्रतिनिधित्व को शुरू करने, उसका मसौदा तैयार करने, मीडिया के ज़रिए उसे फैलाने, उससे जुड़ी बैठकें आयोजित करने, लोगों को शामिल करने या समन्वय करने, समूह की ओर से प्रेस या मीडिया से बात करने, या समन्वय के लिए इस्तेमाल किए गए किसी भी आधिकारिक या संगठित इलेक्ट्रॉनिक या सोशल-मीडिया समूह को चलाने में शामिल थे'। पत्र में ज़ोर दिया गया कि ये सभी काम अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत सुरक्षित हैं।
पत्र में कहा गया कि BCI के पत्रों से ऐसा लगता है मानो छात्र और फैकल्टी "कोई आपराधिक साज़िश रच रहे हों", जबकि भारत में असहमति जताना कोई अपराध नहीं है।
पूर्व छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्थाएं होती हैं और विश्वविद्यालय का जीवन किसी व्यक्ति की यात्रा का वह अनमोल पल होता है, जब वे विचारों के साथ प्रयोग करते हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी उस यात्रा का एक "बुनियादी हिस्सा" है।
भारत की आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र करते हुए, जिसमें अलग-अलग विचारधाराओं वाले वकील औपनिवेशिक शासन का विरोध करने के लिए एकजुट हुए और अपनी बात खुलकर कहने के अधिकार का इस्तेमाल किया था, पूर्व छात्रों ने ज़ोर दिया है कि भारत में कानून के छात्र "उस विरासत के उत्तराधिकारी" हैं।
पूर्व छात्रों ने आग्रह किया कि अगर BCI की इस मामले पर कोई राय है, तो उसे बातचीत और चर्चा की भावना से आगे बढ़ना चाहिए, "ज़बरदस्ती और दबदबे से नहीं"।
पूर्व छात्रों को उम्मीद है कि BCI के भविष्य के कदमों से रेगुलेटर में छात्रों, फैकल्टी और नागरिकों का भरोसा फिर से बहाल होगा।
आज इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्देशों पर कड़ी नाराज़गी जताई। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है और उन्होंने इस मामले में BCI की भूमिका पर सवाल उठाए।
गुरुवार शाम BCI के चेयरमैन ने सभी स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि वे NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, हैदराबाद से 2026 में ग्रेजुएट होने वाले छात्रों को अगले आदेश तक वकील के तौर पर एनरोल न करें। साथ ही उन्होंने यूनिवर्सिटी से उन लोगों के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी, जो चीफ जस्टिस सूर्य कांत के दीक्षांत समारोह में शामिल होने का विरोध करने वाले अभियान में शामिल थे।
कुछ घंटों बाद एनरोलमेंट पर रोक लगाने वाला निर्देश वापस ले लिया गया। शुक्रवार को BCI ने छात्रों के खिलाफ प्रस्तावित जांच भी रद्द कर दी।