शिशु के दुर्लभ आनुवंशिक रोग: कर्नाटक हाईकोर्ट ने त्वरित कार्यवाही के लिए केंद्र की सराहना की, राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के अनुसार आगे की जांच की जाएगी

Update: 2021-10-09 10:05 GMT

Karnataka High Court

कर्नाटक हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक दुर्लभ स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (टाइप 1) बीमारी से पीड़ित डेढ़ साल के बच्चे को चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा की गई त्वरित कार्यवाही की सराहना की।

न्यायमूर्ति कृष्णा एस दीक्षित ने कहा,

"यह अदालत इस मामले में केंद्र सरकार द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई पर प्रसन्नता व्यक्त करती है।"

केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता एमएन कुमार ने अदालत के समक्ष एक ज्ञापन दायर किया। इसमें कहा गया कि एक सितंबर के आदेश के अनुसार बच्चे की जांच की गई और उसकी मेडिकल रिपोर्ट दुर्लभ बीमारियों की आगे की जांच के लिए केंद्रीय तकनीकी समिति, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अध्यक्ष को भेज दी गई।

कुमार ने अदालत को यह भी बताया कि,

"मामले को मंत्रालय में संसाधित किया जा रहा है और राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के अनुसार जांच की जा रही है। इंदिरा गांधी अस्पताल के साथ सेंटर फॉर ह्यूमन जेनेटिक्स में उत्कृष्टता केंद्र भी इसे क्राउडफंडिंग के लिए दुर्लभ रोग पोर्टल पर डालने के लिए संसाधित कर सकता है। दुर्लभ रोगों के लिए केंद्रीय तकनीकी समिति की बैठक आठ अक्टूबर को होनी है, जिसमें इस पर भी चर्चा होगी।'

बच्चे के पिता (नवीन कुमार एन) के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया कि यहां याचिकाकर्ता अपने जीवन को घातक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से बचाने और भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन के अधिकार का लाभ उठाने के लिए अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

याचिका में कहा गया कि बच्चे के पिता ने भारत के प्रधानमंत्री और कर्नाटक के मुख्यमंत्री के कार्यालय से संपर्क करने और जीवन रक्षक दवा खरीदने के उद्देश्य से धन जुटाने के लिए सभी प्रयास किए।

ऐसा कहा जाता है कि Zolgensma (Onaseminogene Abeparvovec) नामक दवा संयुक्त राज्य अमेरिका में निर्मित होती है और इसकी कीमत 2.1 मिलियन अमरीकी डालर है, जो भारतीय मुद्रा में परिवर्तित होने पर लगभग 16 करोड़ रुपये होती है। याचिकाकर्ता का परिवार एक मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से है और वे बच्चे के इलाज के लिए आवश्यक दवा के आयात के लिए धन जुटाने में असमर्थ हैं। हालांकि, क्राउडफंडिंग के जरिए 8.24 करोड़ रुपये की राशि जुटाई गई।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रिंस इसाक ने कहा कि फरवरी से दोनों सरकारें बच्चे की गंभीर स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ हैं। जिस चिकित्सा स्थिति में वह है, वह घातक होने की संभावना है। लेकिन दुर्भाग्य से दोनों सरकारों ने पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं दी।

अदालत ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 16 अक्टूबर की तारीख तय करते हुए पक्षकारों को अनुमति दी कि यदि कोई अत्यावश्यकता है तो वेकेशन कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

केस शीर्षक: मास्टर जेनिश एन. वी. यूनियन ऑफ इंडिया।

केस नंबर: डब्ल्यूपी 17626/2021।

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