राजस्थान हाईकोर्ट ने पाली ज़िले के जवाई इलाके में तेंदुए के रहने की जगह (हैबिटैट) की सुरक्षा को लेकर चिंता जताने वाली और निर्माण व पर्यटन पर नियम बनाने की मांग करने वाली PIL (जनहित याचिका) का निपटारा किया। कोर्ट ने जवाई लेपर्ड कंजर्वेशन रिज़र्व की नोटिफाइड सीमा से एक किलोमीटर के दायरे को 'अंतरिम रेगुलेटरी थ्रेशोल्ड' (नियमन की अंतरिम सीमा) घोषित किया।

यह साफ़ किया गया,

“इसलिए इस दूरी को कोई पक्की इकोलॉजिकल सीमा या निर्माण-मुक्त दायरा नहीं माना जा रहा है। इसे एक अंतरिम और सबूतों पर आधारित नियमन सीमा के तौर पर अपनाया गया। यह तब तक लागू रहेगा जब तक राज्य सरकार जियो-रेफरेंस्ड मैपिंग, इकोलॉजिकल और क्षमता-आकलन (कैरिंग-कैपेसिटी असेसमेंट) पूरा नहीं कर लेती और एक ऐसी व्यापक नीति नहीं बना लेती, जो उन इलाकों की पहचान कर सके जिन्हें पूरी सुरक्षा की ज़रूरत है और जहाँ नियम के साथ या मंज़ूरी के साथ गतिविधियाँ की जा सकती हैं।”

साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि कुछ गाँव और ज़रूरी गतिविधियों को सिर्फ़ इसलिए प्रतिबंधित नहीं माना जाएगा कि वे 1 किलोमीटर के दायरे में आती हैं। इनमें रिहायशी निर्माण; बिना ज़्यादा विस्तार के मरम्मत या पुनर्निर्माण; स्कूल, आंगनवाड़ी, पीने के पानी की सुविधाएँ; पारंपरिक खेती, पशु चराना और आजीविका से जुड़ी अन्य पारंपरिक गतिविधियाँ शामिल हैं। बशर्ते, कानून के मुताबिक ज़रूरी मंज़ूरी ली गई हो और वन्यजीव-अनुकूल शर्तों का पालन किया गया हो।

23 मार्च 2026 और 4 अप्रैल 2026 के पिछले आदेशों और पिछली सुनवाई में राज्य द्वारा पेश SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) को जारी रखने का आदेश देते हुए जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस रेखा बोराना की डिवीज़न बेंच ने कुछ और निर्देश भी दिए। ये निर्देश तब तक लागू रहेंगे जब तक राज्य सरकार एक व्यापक नीति नहीं बना लेती और उसे नोटिफ़ाई नहीं कर देती।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि इलाके में तेंदुए की गुफ़ाओं और पहाड़ियों के पास बिना नियमन वाले निर्माण, कमर्शियल पर्यटन, पहाड़ काटने आदि से उनके रहने की जगह (हैबिटैट) में खलल पड़ रहा है। इसलिए इलाके में तेंदुए की गुफ़ाओं, मांदों, प्रजनन स्थलों और कॉरिडोर की वैज्ञानिक मैपिंग करने और उनके 1 किलोमीटर के दायरे में निर्माण पर सख़्ती से रोक लगाने की मांग की गई।

तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) के सिद्धांत के तहत ऐसे मामलों में एहतियाती कदम उठाना ज़रूरी है जहाँ गंभीर और कभी न ठीक होने वाले इकोलॉजिकल नुकसान का ख़तरा हो। हालांकि, साथ ही नियमों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कमर्शियल गतिविधियों और उस इलाके में लंबे समय से रह रहे समुदायों की सामान्य रिहायशी, कृषि और नागरिक ज़रूरतों के बीच फ़र्क करना भी ज़रूरी था। कोर्ट ने 1 किलोमीटर की दूरी के पीछे के तर्क को समझने के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों पर गौर किया और पाया कि उपलब्ध जानकारी 1 किलोमीटर की दूरी को एहतियाती स्क्रीनिंग और रेगुलेटरी दूरी मानने के लिए एक तार्किक वैज्ञानिक आधार दिखाती है।

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का 1000 मीटर के दायरे में हर तरह के निर्माण पर पूरी तरह और बिना किसी भेदभाव के रोक लगाने का प्रस्ताव, या आवेदक का सिर्फ़ 100 मीटर से ज़्यादा की दूरी पर रेगुलेटेड निर्माण की इजाज़त देने का प्रस्ताव—इनमें से किसी को भी जवाई इलाके के लिए अंतिम इकोलॉजिकल मानक के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, वैज्ञानिक मूल्यांकन पूरा होने तक बिना किसी रोक-टोक के निर्माण की इजाज़त भी नहीं दी जा सकती।

इस पृष्ठभूमि में यह माना गया:

“यहां बताए गए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक तथ्यों, एहतियाती सिद्धांत, राज्य सरकार के 31.03.2015 के उस आदेश जिसमें एक किलोमीटर के रेगुलेटरी ज़ोन का ज़िक्र है। जवाई इलाके के लिए किसी व्यापक नीति के न होने की बात को ध्यान में रखते हुए यह कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि पहचान किए गए तेंदुए के अहम आवास क्षेत्रों के आसपास एक किलोमीटर की हवाई दूरी को—वैज्ञानिक समीक्षा के अधीन और अंतरिम तौर पर—निर्माण-नियंत्रण और अनिवार्य इकोलॉजिकल-जांच ज़ोन के रूप में उचित रूप से लागू किया जा सकता है।”

इसके अनुसार, PIL का निपटारा कर दिया गया।

Title: Apporva Agrawat v State of Rajasthan & Ors.

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