9 घंटे हिरासत में रखने का मामला: पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी ने 'X' पोस्ट को लेकर दर्ज FIR की कॉपी के लिए कोर्ट का रुख किया
पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी ने दिल्ली कोर्ट में अर्ज़ी देकर X कॉर्प (पहले ट्विटर) पर किए गए पोस्ट के मामले में अपने खिलाफ दर्ज FIR की कॉपी मांगी। उन्हें 2 सितंबर को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 9 घंटे तक हिरासत में रखकर पूछताछ की थी।
उनकी अर्ज़ी पर मंगलवार को चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मृदुल गुप्ता सुनवाई करेंगे।
जोशी ने स्पेशल सेल के SHO या जांच अधिकारी को निर्देश देने की मांग की कि उन्हें संबंधित FIR की कॉपी तुरंत उपलब्ध कराई जाए।
अर्ज़ी के अनुसार, लगभग 60 वर्षीय जोशी 2 सितंबर को सुबह करीब 8:45 बजे नेहरू पार्क के पास अपनी मॉर्निंग वॉक से लौट रहे थे, तभी स्पेशल सेल के अधिकारी होने का दावा करने वाले दो लोगों ने उनसे संपर्क किया और उनके X अकाउंट से किए गए एक कथित ट्वीट के सिलसिले में पूछताछ के लिए अपने साथ चलने को कहा।
अर्ज़ी में कहा गया कि अधिकारियों ने जोशी को बताया कि उन्हें एक FIR में आरोपी बनाया गया, लेकिन उन्हें FIR की कॉपी नहीं दी।
जोशी का दावा है कि उन्होंने अधिकारियों का सहयोग किया और उनके साथ स्पेशल सेल पुलिस स्टेशन गए, जहां उन्हें लगभग सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक, यानी नौ घंटे से ज़्यादा समय तक हिरासत में रखकर पूछताछ की गई।
अर्ज़ी में आगे कहा गया है कि पूछताछ के दौरान जोशी ने बार-बार अधिकारियों से FIR की कॉपी देने का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें वह कॉपी नहीं दी गई।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिरासत में रखे जाने के बावजूद, स्पेशल सेल के अधिकारियों ने उनकी पत्नी को उनके ठिकाने के बारे में सूचित नहीं किया, जिससे उनके परिवार को "गहरी चिंता, उत्पीड़न और मानसिक पीड़ा" का सामना करना पड़ा।
अर्ज़ी में आगे कहा गया कि इसके बाद जोशी ने 3 सितंबर को दिल्ली पुलिस कमिश्नर और स्पेशल सेल के डिप्टी कमिश्नर को आवेदन देकर FIR की कॉपी मांगी। हालांकि, उसके बाद 72 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो FIR की कॉपी दी गई और न ही कोई जवाब मिला।
अर्ज़ी में कहा गया कि जिस व्यक्ति का नाम FIR में है, या जिसे यह मानने का कारण है कि उसका नाम उसमें हो सकता है, उसे FIR की कॉपी उपलब्ध कराना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 से मिलने वाला एक कानूनी अधिकार है और यह जांच एजेंसी की मर्जी पर निर्भर नहीं है।
याचिका में कहा गया,
"हिरासत में लिए जाने के समय और उसके बाद लिखित रूप में बार-बार और खास तौर पर अनुरोध करने के बावजूद, आवेदक को FIR की कॉपी न देना कानून के स्थापित नियमों के खिलाफ है। इससे आवेदक को गंभीर नुकसान, अनिश्चितता और परेशानी हुई है, क्योंकि उसे अपने खिलाफ लगे आरोपों (अगर कोई हैं) की सही जानकारी नहीं है।"
इसमें यह भी कहा गया कि जोशी ने ऐसा कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) नहीं किया है जिसके लिए उन्हें हिरासत में लेने और पूछताछ करने की ज़रूरत हो।
उन्होंने कहा,
"FIR की कॉपी न होने के कारण आवेदक अपने खिलाफ लगे आरोपों की सही प्रकृति का पता नहीं लगा पा रहा है। इस तरह FIR की कॉपी न देना सीधे तौर पर आवेदक के कानूनी प्रावधानों के अनुसार कानूनी राहत पाने के अधिकार का उल्लंघन करता है।"
जोशी का पक्ष वकील आदिल सिंह बोपाराई, रोनित बोस और निकुंज बिंदल रख रहे हैं।