केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने माना कि जब अभियुक्त को यह जानकारी है कि उसने जो कार्य किया है, उससे किसी की मृत्यु संभव है और यह जानने के बाद भी वह कार्य करता है और उसके परिणामस्वरूप किसी की मृत्यु हो जाती है, यह धारा 304 भाग II आईपीसी के अंतर्गत आएगा।

जस्टिस ए बधारुद्दीन ने धारा 304 ए और धारा 304 भाग II आईपीसी के तहत आने वाले अपराधों के बीच अंतर करते हुए कहा कि जब इरादा या ज्ञान कृत्य की प्रत्यक्ष प्रेरक शक्ति है, आईपीसी की धारा 304 ए को सदोष मानवहत्य के लिए गंभीर और अधिक गंभीर आरोप के लिए जगह बनानी होगी।

उन्होंने कहा,

"कानून इस बिंदु पर स्पष्ट है कि जब अभियुक्त को यह जानकारी हो कि उसने जो कार्य किया है, उससे किसी व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना है और उक्त ज्ञान के साथ उसने कार्य किया था और उसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की मृत्यु हो गई, यह निश्चित रूप से आईपीसी की धारा 304 भाग II के तहत आने वाला मामला होगा।

इस मामले में मामला यह है कि पहले आरोपी, जिसकी बायीं कलाई पर विकृति थी और जिसके पास उचित और वैध ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था, ने इस ज्ञान के साथ एक बस चलाई थी कि इससे दुर्घटना होने की संभावना है और घातक परिणाम हो सकते हैं। बस सड़क के दाहिनी ओर एक पुलिया से टकराकर सड़क के दूसरी ओर गहराई में जा गिरी, जिससे बस में सवार 5 लोगों की मौत हो गयी और 63 यात्री गंभीर रूप से घायल हो गये।

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि दूसरा आरोपी, जो पहले आरोपी का भाई है और बस के मालिक ने पहले आरोपी को बस चलाने के लिए अधिकृत किया था, इस ज्ञान के साथ कि ऐसे व्यक्ति को वाहन चलाने के लिए अधिकृत करने से संभावित नुकसान हो सकता है। इस प्रकार अभियोजन का मामला यह है कि दोनों आरोपियों ने सामान्य इरादे से आईपीसी की धारा 304 भाग II सहपठित धारा 34 के तहत अपराध किया।

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट एसएम प्रेम और केपी संथी ने आईपीसी की धारा 304 के तहत दोषसिद्धि और सजा को बरी करने या बदलने के लिए दबाव डाला और आग्रह किया कि निचली अदालत के निष्कर्ष गलत हैं क्योंकि अभियोजन पक्ष आरोपी द्वारा किए गए किसी भी अपराध को साबित करने में विफल रहा है और तब भी दोषसिद्धि धारा 304ए आईपीसी के तहत धारा 304 भाग II सहपठित 34 आईपीसी के तहत अपराध के लिए होनी चाहिए थी।

हालांकि, वरिष्ठ लोक अभियोजक, एडवोकेट डेनी देवसी ने प्रस्तुत किया कि दूसरे आरोपी ने पहले आरोपी को बस चलाने के लिए अधिकृत किया था, जिसके बाएं हाथ में विकृति थी और जिसके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, जिसके परिणामस्वरूप 5 लोगों की मृत्यु हो गई और 63 लोगों को गंभीर चोटें आई हैं। इसलिए, आईपीसी की धारा 304 भाग II सहपठित 34 के तहत विचारित ज्ञान दोनों आरोपियों की ओर से अच्छी तरह से आकर्षित होता है क्योंकि गवाहों ने इस आशय का सबूत दिया कि वाहन की तेज गति के परिणामस्वरूप दुर्घटना हुई थी।

इस सवाल का जवाब देते हुए कि क्या आरोपी व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध धारा 304 ए या 304 भाग II आईपीसी के तहत आता है, अदालत ने कहा कि प्रत्येक धारा को बनाने वाले अवयवों पर गौर करना आवश्यक है। कोर्ट ने एलिस्टर एंथोनी परेरा बनाम महाराष्ट्र राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहुत भरोसा किया, जिसमें यह देखा गया था कि:

ऐसे मामले में जहां लापरवाही या उतावलापन मौत का कारण है और इससे ज्यादा कुछ नहीं, धारा 304-ए को आकर्षित किया जा सकता है, लेकिन जहां जल्दबाजी या लापरवाही का कार्य इस ज्ञान के साथ किया जाता है कि इस तरह के कार्य से मृत्यु होने की संभावना है, धारा 304 भाग II आईपीसी आकर्षित हो सकती हैं और यदि इस तरह के उतावले और लापरवाह कार्य गलत करने वाले की ओर वास्तविक इरादे के सा‌थ किया गया हो और मौत का कारण बने तो अपराध आईपीसी की धारा 302 के तहत दंडनीय हो सकता है।

एलिस्टर एंथोनी परेरा बनाम महाराष्ट्र राज्य, स्टेट Tr पीएस लोधी कॉलोनी नई दिल्ली बनाम संजीव नंदा और सुप्रीम कोर्ट के कई अन्य फैसलों का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि इस बिंदु पर यह स्पष्ट है कि जब आरोपी को यह जानकारी होती है कि उसने जो कार्य किया है, वह किसी मृत्यु का कारण बन सकता है और उक्त ज्ञान के साथ उसने कार्य किया था और उसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो यह धारा 304 भाग II आईपीसी के तहत आएगा। किसी व्यक्ति को मारने के इरादे से कोई कार्य करना या यह जानना कि किसी कार्य को करने से किसी व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना है, सदोष मानवहत्या है।

जस्टिस बधारुद्दीन ने कहा कि आईपीसी की धारा 304 भाग II के तहत दंडनीय अपराध का गठन करने के लिए सामग्री निम्नलिखित हैं:

(i) यह कार्य अभियुक्त द्वारा किया गया था;

(ii) आरोपी के उक्त कृत्य से मृत्यु हुई

(iii) उक्त कार्य 'ज्ञान' के साथ किया गया था कि इससे मृत्यु होने की संभावना है।

इसके अलावा, अदालत ने यह भी माना कि आईपीसी की धारा 304 ए के तहत अपराध का गठन करने वाली सामग्री, आईपीसी की धारा 299 या धारा 300 की सामग्री को पूरी तरह से बाहर रखा गया है और उक्त अपराध में उतावलेपन या लापरवाही से किया गया कार्य या अभियुक्त का उक्त कार्य शामिल है यदि वह मृत्यु कारित करता है और उक्त कार्य बिना इरादे या ज्ञान के किया गया है जिससे मृत्यु होने की संभावना है।

इस प्रकार, अदालत ने माना कि यह स्थापित कानून है कि किसी मामले में लगाई जाने वाली सजा उस अत्याचार और क्रूरता के अनुरूप होनी चाहिए जिसके साथ अपराध किया गया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा लगाई गई सजा को उचित पाया और इस तरह निचली अदालत द्वारा लगाए गए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

केस शीर्षक: मार्टिन @ जिनू सेबेस्टियन और अन्य बनाम केरल राज्य

साइटेशन: 2022 लाइव लॉ (केरल) 345

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