कस्टडी पाने के लिए माता-पिता का नाबालिग बच्चे के साथ लगाव होना जरूरी, प्राकृतिक अभिभावक होना एकमात्र मानदंड नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Update: 2022-12-23 14:06 GMT
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि सिर्फ इसलिए कि पिता नाबालिग बेटे का प्राकृतिक अभिभावक है, कस्टडी के मुद्दे पर स्वत: ही उसके पक्ष में फैसला नहीं किया जा सकता है।

जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की खंडपीठ ने दोहराया कि ऐसे मामलों में बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता दी जाती है और माता-पिता में कस्टडी पाने के लिए नाबालिग बच्चे के साथ वास्तविक लगाव होना चाहिए।

कोर्ट फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 19(1) के तहत एक नाबालिग लड़के के पिता द्वारा दायर एक अपील पर निर्णय दे रहा था। हिंदू माइनॉरिटी एंड गॉर्डियनशिप एक्ट की धारा 6 के तहत बेटे की गॉर्डियनशिप प्राप्त करने के लिए दायर पिता के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। बेटे की गॉर्डियनशिप नाना के पास है।

अपीलकर्ता-पिता ने कहा कि उसने 15 साल पहले मोहिनी बाई नामक महिला से शादी की थी और विवाह बाद उन्हें एक बेटा पैदा हुआ था।

उसने तर्क दिया कि बाद में उसकी पत्नी की रीढ़ की हड्डी टूट गई, जिसके बाद वह उसने इलाज कराया और उसकी देखभाल करता था। पति के अनुसर पत्नी 2014 में उसका घर छोड़कर मायके चली गई और अनुरोध के बावजूद वापस आने से इनकार कर दिया।

बाद में पत्नी ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट के समक्ष एक आवेदन दायर किया हालांकि कार्यवाही के दरमियान उसकी मृत्यु हो गई। कोर्ट ने आवेदन की अनुमति दी और 2,000 रुपये के भरणपोषण का निर्देश दिया। इस बीच, बच्चा नाना (प्रतिवादी) की कानूनी कस्टडी में रहा।

बाद में अपीलकर्ता ने इस आधार पर बच्चे की कस्टडी का दावा करते हुए एक आवेदन दायर किया कि वह बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते कानूनी रूप से कस्टडी का हकदार है। यह दलील दी गई कि वह आर्थिक रूप से संपन्न है और बच्चे को उसके पिता के प्यार और स्नेह से वंचित करना उचित नहीं होगा।

हालांकि, प्रतिवादी ने अपनी दलील में कहा कि पत्नी की मृत्यु अपीलकर्ता द्वारा उस पर की गई शारीरिक क्रूरता के कारण हुई। दादा ने कहा कि अपीलकर्ता बेटे के जन्म के बाद कभी उसके पास नहीं गया और उसने दूसरी शादी भी कर ली। यह भी जोड़ा गया कि प्रतिवादी पूरी सावधानी और देखभाल के साथ बच्चे का भरण-पोषण कर रहा है।

फैमिली कोर्ट ने इस तरह कस्टडी के लिए अपीलकर्ता के आवेदन को खारिज कर दिया।

अपीलकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट हेमंत केशरवानी ने कहा कि फैमिली कोर्ट को नाबालिग बच्चे के सर्वोपरि हित पर विचार करना चाहिए था, और वह यह मानने में विफल रही कि पिता एक प्राकृतिक अभिभावक है और नाबालिग बच्चे की कस्टडी पाने का हकदार है।

हालांकि, प्रतिवादियों की ओर से पेश एडवोकेट अभिषेक शर्मा ने कहा कि अपीलकर्ता के पास नाबालिग बच्चे को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए आय का कोई पर्याप्त साधन नहीं है और तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट के फैसले में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

कोर्ट ने याद दिलाया कि किसी कोर्ट द्वारा हिंदू नाबालिग के संरक्षक के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति या घोषणा में, नाबालिग का कल्याण सर्वोपरि होगा। अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 17 के तहत, न्यायालय का यह कर्तव्य है कि संरक्षकता के लिए प्रतिद्वंद्वी दावेदारों में से सबसे उपयुक्त व्यक्ति को नियुक्त करे।

डिवीजन बेंच ने यह भी पाया कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने दोहराया था कि बच्चे के कल्याण को एक नाबालिग बच्चे की कस्टडी से संबंधित एक कानून के तहत माता-पिता के अधिकारों पर प्राथमिकता दी जाती है। अतहर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद और अन्य [(2010) 2 SCC 654] में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता की दूसरी शादी उसे बच्चों की कस्टडी से वंचित नहीं कर सकता है, फिर भी यह एक ध्यान में रखा जाने वाला कारक है।

अपीलकर्ता की कस्टडी की प्रार्थना को खारिज करते हुए, फैमिली कोर्ट ने पाया था कि न तो अपीलकर्ता और न ही उसके माता-पिता ने कभी बच्चे के बारे में पूछताछ की और न ही किसी भी अवसर पर उससे मिलने गए, और इसलिए, केवल इसलिए कि पिता (अपीलकर्ता) प्राकृतिक अभिभावक है, बच्चे की कस्टडी उसे नहीं सौंपी जा सकती।

कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। हालांकि, पिता को फैमिली कोर्ट के समक्ष महीने में एक बार मुलाकात का अधिकार दिया गया और पाक्षिक रूप से संपर्क करने का अधिकार दिया गया।

केस टाइटल: प्रभात बनाम XXX और अन्य।

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