'सरकारी फंड के दुरुपयोग' मामले में पूर्व सीएम नवीन पटनायक को राहत, कोर्ट ने शिकायत खारिज करने का फैसला सही ठहराया
उड़ीसा कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पूर्व सीएम और बीजू जनता दल (BJD) प्रमुख नवीन पटनायक और उनके तत्कालीन निजी सचिव (जो '5T' सेक्रेटरी भी थे) वी. कार्तिकेयन पांडियन के खिलाफ मामला खारिज कर दिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने सरकारी खजाने से फंड की मंजूरी के बिना बैठकों और प्रचार के लिए अलग-अलग जिलों में 300 से ज़्यादा हेलिकॉप्टर यात्राएं की थीं।
रिविजन याचिका पर फैसला सुनाते हुए भुवनेश्वर में खुर्दा के सेशन जज बिरंची नारायण मोहंती ने पाया कि शिकायत को आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस आधार नहीं है।
जज ने कहा,
“यह अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि शिकायतकर्ता/याचिकाकर्ता ने न तो शिकायत याचिका में बताई गई किसी भी दंडात्मक धारा के तहत कोई मामला साबित करने के लिए सबूत पेश किए, न ही शिकायत पेश करने से पहले BNSS, 2023 की धारा 173(4) का अनिवार्य पालन किया, और न ही BNSS, 2023 की धारा 33 के तहत शिकायत पेश करने का उनका कोई कानूनी अधिकार (locus-standi) बनता था।”
याचिकाकर्ता सुधीर चरण मोहंती पेशे से वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री और उनके निजी सचिव ('विपक्षी पक्ष') ने 500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का गबन किया। यह बात कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर कई RTI आवेदनों से सामने आई, जिन्हें शिकायत मामले में गवाह के तौर पर पेश किया गया। उनका यह भी आरोप था कि उन्होंने इस पैसे का इस्तेमाल जनसभाओं के लिए अलग-अलग जिलों में हेलिकॉप्टर यात्राएं करने में किया।
इसके बाद उन्होंने 14.08.2024 को भुवनेश्वर के कैपिटल पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दर्ज कराई। जब पुलिस ने FIR दर्ज करने से इनकार किया तो उन्होंने वही शिकायत भुवनेश्वर के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) को भेजी। जब DCP ने भी कोई कार्रवाई नहीं की तो उन्होंने भुवनेश्वर के सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (SDJM) के सामने शिकायत का मामला दायर किया। हालांकि, SDJM ने मुख्य रूप से दो आधारों पर मामला खारिज कर दिया: BNSS की धारा 173(4) का पालन न करना और शिकायत का बहुत सामान्य (Omnibus) होना, जिसमें कोई ठोस आधार नहीं था।
विवादित आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने BNSS की धारा 438(1) के तहत सेशन जज के सामने यह रिविज़न याचिका दायर की। प्रतिवादी पक्षकारों की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अशोक परिजा ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता/शिकायतकर्ता को FIR की वही सटीक कॉपी DCP को भेजनी थी, जो उसने कैपिटल पुलिस स्टेशन में पेश की थी। हालांकि, उसने ओरिजिनल FIR की कॉपी के बिना DCP को एक अस्पष्ट पत्र भेजा, जो BNSS की धारा 173(4) का पालन नहीं माना जाएगा।
BNSS की धारा 173(4) इस प्रकार है,
“कोई भी व्यक्ति जो पुलिस स्टेशन के इंचार्ज ऑफिसर द्वारा उप-धारा (1) में बताई गई जानकारी को दर्ज करने से इनकार करने से असंतुष्ट है, वह ऐसी जानकारी का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबंधित पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) को भेज सकता है। यदि पुलिस अधीक्षक संतुष्ट हो जाते हैं कि ऐसी जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के होने का पता चलता है तो वे या तो खुद मामले की जांच करेंगे या अपने अधीन किसी पुलिस अधिकारी को इस संहिता में बताए गए तरीके से जांच करने का निर्देश देंगे। ऐसे अधिकारी के पास उस अपराध के संबंध में पुलिस स्टेशन के इंचार्ज ऑफिसर की सभी शक्तियां होंगी। ऐसा न होने पर वह असंतुष्ट व्यक्ति मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है।”
कोर्ट ने तीन दस्तावेजों की जांच की: पुलिस स्टेशन में जमा की गई FIR, DCP को भेजा गया पत्र और शिकायत। यह देखा गया कि तीनों में अलग-अलग आरोप लगाए गए और DCP को भेजे गए पत्र में सामान्य और अस्पष्ट आरोप (Omnibus Allegations) थे। इसके अलावा, सेशन जज ने DCP को FIR का सार भेजने में एक और प्रक्रियात्मक कमी की ओर इशारा किया।
उन्होंने कहा,
“इसके अलावा, BNSS की धारा 173(4) यह अनिवार्य करती है कि रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक/DCP को डाक द्वारा भेजी जानी चाहिए। इस मामले में याचिकाकर्ता ने 14.08.2024 या 19.08.2024 की रिपोर्ट DCP, भुवनेश्वर को डाक से नहीं भेजी थी, बल्कि इसे DCP, भुवनेश्वर के कार्यालय में पहुंचाया गया बताया गया। याचिकाकर्ता DCP, भुवनेश्वर के कार्यालय में 19.08.2024 की अपनी रिपोर्ट की प्राप्ति को प्रमाणित करने में विफल रहा है।”
प्रीति अगरवाला और अन्य बनाम GNCT दिल्ली राज्य और अन्य मामले (2024 LiveLaw (SC) 394) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 175(3) के तहत शिकायत को लोकल पुलिस के पास रजिस्ट्रेशन और जांच के लिए भेजने से पहले, मजिस्ट्रेट को यह पक्का करना होगा कि शिकायत से कोई कॉग्निज़ेबल अपराध (ऐसा अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ़्तार कर सकती है) बनता है या नहीं। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए "कागज का एक टुकड़ा" भी पेश नहीं किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे BNSS की धारा 33 के तहत भी शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार (locus standi) नहीं है।
इसलिए मजिस्ट्रेट का आदेश रिवीजन में सही ठहराया गया।
Case Title: Sudhir Charan Mohanty v. Sri Vairab Karthikeyan Pandian & Anr.