पाकिस्तान के साथ संवेदनशील सैन्य जानकारी साझा करने के आरोपी व्यक्ति को मिली ज़मानत
राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसे व्यक्ति को ज़मानत दी, जिस पर सैन्य ठिकानों से जुड़ी रणनीतिक और संवेदनशील जानकारी पाकिस्तानी हैंडलर्स तक पहुंचाने के 'गंभीर आरोप' हैं। कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि जांच एजेंसियां गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी लिखित रूप में देने की अनिवार्य शर्त को पूरा करने में विफल रहीं।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की पीठ ने कहा कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद उनके पास ज़मानत देने के अलावा 'कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था'। पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जिन मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता पर गंभीर परिणाम पड़ने की आशंका हो, वहां संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
कोर्ट ने आगे यह राय व्यक्त की कि गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित करने का कर्तव्य न केवल गिरफ्तारी करने वाले जांच अधिकारी पर था, बल्कि अभियोजन एजेंसी और रिमांड की कार्यवाही की निगरानी करने वाले मजिस्ट्रेट पर भी था।
अतः कोर्ट ने इन चूकों के लिए तीनों अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया।
बता दें, कोर्ट उस आरोपी की ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिस पर ऊपर बताए गए आरोपों के तहत 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923' और 'BNS, 2023' के तहत आरोप लगाए गए।
आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि अनिवार्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया और उसकी गिरफ्तारी से पहले गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी उसे न तो दी गई और न ही प्रभावी ढंग से समझाई गई।
इसके विपरीत, लोक अभियोजक ने यह दलील दी कि आरोपी को 'गिरफ्तारी मेमो' के माध्यम से गिरफ्तारी के कारणों से अवगत करा दिया गया। इसके अलावा, आरोपी ने सबसे शुरुआती चरण में—यानी रिमांड की कार्यवाही के दौरान या गिरफ्तारी के तुरंत बाद—इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं उठाई।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देने का संवैधानिक सुरक्षा उपाय संविधान के अनुच्छेद 21 से उत्पन्न होता है। इसे वैधानिक रूप से BNS की धारा 47 के तहत भी शामिल किया गया।
कोर्ट ने यह फैसला दिया कि इस प्रावधान के तहत पुलिस अधिकारी या गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति पर यह अनिवार्य दायित्व है कि वह आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दे।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के केस मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) का हवाला देते हुए यह फ़ैसला दिया,
“गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी लिखित रूप में, गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को समझ में आने वाली भाषा में दी जानी ज़रूरी है; और अगर गिरफ़्तारी से पहले या तुरंत बाद यह जानकारी नहीं दी जाती है तो भी गिरफ़्तारी को अवैध नहीं माना जाएगा, बशर्ते कि ये कारण एक उचित समय के भीतर और मजिस्ट्रेट के सामने रिमांड की कार्यवाही शुरू होने से पहले बता दिए जाएँ।”
इसलिए कोर्ट ने कहा कि अगर इस अनिवार्य ज़िम्मेदारी को पूरा नहीं किया जाता है तो आरोपी को ज़मानत पर रिहा कर दिया जाएगा।
Title: Jhabra Ram v State of Rajasthan