मप्र हाईकोर्ट ने सांसद/विधायकों को आजीवन पेंशन के लिए पांच साल कार्यकाल की अनिवार्यता संबंधी याचिका खारिज की

Update: 2022-08-15 04:30 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सांसद/विधायकों की आजीवन पेंशन के लिए कम से कम पांच साल का कार्यकाल पूरा करने की पात्रता निर्धारित करने को लेकर भारत सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश देने संबंधी एक जनहित याचिका (पीआईएल) हाल ही में खारिज कर दी।

जस्टिस विवेक रसिया और जस्टिस अमर नाथ (केशरवानी) की खंडपीठ ने पेशे से वकील याचिकाकर्ता पर 10,000/- रुपये का जुर्माना भी लगाया और कहा कि याचिकाकर्ता ने इस विषय पर उचित शोध नहीं किया।

संक्षेप में जनहित याचिका

कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता पुरवा जैन ने दलील दी कि लोक सेवकों और हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के समान ही संसद सदस्य (एमपी) और विधान सभा सदस्य (एमएलए) को पेंशन देने के लिए भी प्रासंगिक नियमों और विनियमों में न्यूनतम योग्यता अवधि निर्धारित होनी चाहिए। ।

उनकी याचिका में, मध्य प्रदेश विधानसभा सदस्य (वेतन भत्ता तथा पेंशन) अधिनियम, 1972 की धारा 6ए(1) को चुनौती दी गई थी और उनकी आजीवन पेंशन के लिए पांच साल के कार्यकाल की अनिवार्य पात्रता निर्धारित करने का विधायिका को निर्देश देने की मांग की गयी थी।

याचिकाकर्ता ने 1972 के अधिनियम की धारा 6ए(3) की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी थी और विधायिका से इस आशय का प्रावधान करने का निर्देश देने की मांग की थी कि एमएलए को उसके द्वारा छोड़े गए अंतिम कार्यालय के लिए ही केवल एक पेंशन मिलनी चाहिए।

याचिका में संसद सदस्यों का वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 की धारा 8ए(1) के प्रावधान पर भी सवाल उठाया गया था और सांसदों की आजीवन पेंशन के लिए न्यूनतम पात्रता के रूप में पांच साल के कार्यकाल की अनिवार्यता निर्धारित करने के वास्ते संबंधित प्रावधान में संशोधन की मांग की गई थी ।

इसी तरह, 1954 के अधिनियम की धारा 8ए(3) में उपयुक्त संशोधन के माध्यम से सांसदों को केवल एक पेंशन पाने के लिए प्रतिबंधित करने की मांग की गयी थी।

कोर्ट की टिप्पणियां

कोर्ट ने संज्ञान लिया कि 1972 के अधिनियम की धारा 6ए(1) की वैधता को 'रघु ठाकुर बनाम मध्य प्रदेश सरकार आईएलआर (1996) मप्र 334, 1996 के मामले में बरकरार रखा गया था और इस प्रकार कोर्ट ने कहा कि एक वकील होने के नाते, याचिकाकर्ता को धारा 6ए(1) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली यह याचिका दायर करने से पहले होमवर्क करना चाहिए था।

इसके अलावा, जहां तक सांसदों और विधायकों को देय पेंशन का संबंध है, तो कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई शिकायतों को ''लोक प्रहरी (महासचिव एस. एन. शुक्ला एवं अन्य के जरिये) बनाम भारत सरकार (सचिव एवं अन्य के जरिये) (2018) 16 एससीसी 696'' के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया था।

इस अर्जी के संबंध में कि सांसदों और विधायकों को पेंशन प्रदान करने के लिए सरकारी कर्मचारियों/लोक सेवकों पर लागू न्यूनतम पात्रता अवधि की अनिवार्यता होनी चाहिए, कोर्ट ने ''अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत सरकार और अन्य (2019) 11 एससीसी 683'' के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए विवाद खारिज कर दिया।

नतीजतन, यह देखते हुए कि एक वकील द्वारा उचित शोध के यह याचिका दायर की गई थी, कोर्ट ने 10 हजार रुपये के जुर्माने के साथ याचिका खारिज कर दी और इस प्रकार कहा:-

"यदि कोई अधिवक्ता जनहित याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो यह उम्मीद की जाती है कि इस विषय पर उचित शोध किया गया होगा। अधिवक्ता होने के नाते याचिकाकर्ता को इस प्रकार की याचिका दायर करने से पहले शोध करना चाहिए था। याचिका में उठाये गये सभी मुद्दे या तो इस कोर्ट में या सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से विचारित किये जा चुके हैं।"


केस टाइटल : पुरवा जैन बनाम भारत सरकार एवं अन्य



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