सोशल मीडिया पर प्रसारित भाषण का मामला: RSS नेता प्रभाकर भट्ट के खिलाफ दर्ज FIR पर हाइकोर्ट की रोक
कर्नाटक हाइकोर्ट ने शुक्रवार को RSS नेता प्रभाकर भट्ट के खिलाफ दर्ज FIR की जांच पर अंतरिम रोक लगाई। यह FIR पुत्तूर के एक कॉलेज में दिए गए उनके भाषण से जुड़ी है जिसे बाद में एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किया गया।
हाइकोर्ट ने यह राहत सुप्रीम कोर्ट के हालिया उस फैसले का हवाला देते हुए दी, जिसमें सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामलों में FIR दर्ज करने को लेकर जारी दिशा-निर्देशों को बरकरार रखा गया।
प्रभाकर भट्ट ने पुत्तूर टाउन थाने में उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग करते हुए हाइकोर्ट का रुख किया। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 (धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना), 299 (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से जानबूझकर किया गया कृत्य), 302 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्दों का प्रयोग), 353(2) (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान) और धारा 3(5) (सामान्य आशय) के तहत मामले दर्ज किए गए।
सुनवाई की शुरुआत में प्रभाकर भट्ट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरुणा श्याम ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राज्य बनाम नल्ला बालू मामले में तेलंगाना हाइकोर्ट द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों को सही ठहराया है।
इन दिशा-निर्देशों में कहा गया कि सोशल मीडिया पर दिए गए बयानों या पोस्ट के आधार पर केवल कठोर, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक राजनीतिक भाषण होने मात्र से FIR दर्ज नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने सतेंद्र कुमार अंटिल बनाम सीबीआई मामले का भी हवाला दिया।
सीनियर एडवोकेट ने कोर्ट से कहा,
“अब समय आ गया है कि माननीय न्यायालय उन्हीं दिशा-निर्देशों को दोहराए ताकि वे FIR दर्ज करने और आगे की कार्रवाई दोनों पर समान रूप से लागू हो सकें।”
तेलंगाना हाइकोर्ट के दिशा-निर्देशों में कहा गया कि सोशल मीडिया पोस्ट के संबंध में वैमनस्य फैलाने, जानबूझकर अपमान, सार्वजनिक उपद्रव, सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा या देशद्रोह जैसे आरोपों में तब तक मामला दर्ज नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि हिंसा, घृणा या सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काने का प्रथम दृष्टया ठोस आधार मौजूद न हो।
इन मानकों को केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य और श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ मामलों में तय सिद्धांतों के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि स्वचालित या यांत्रिक गिरफ्तारी की अनुमति नहीं है और आपराधिक प्रक्रिया में अनुपातिकता का पालन जरूरी है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में कहा,
“मुद्दा उस भाषण से जुड़ा है, जिसे याचिकाकर्ता ने दिया और जिसे सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में तेलंगाना हाइकोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों की पुष्टि की, जिनमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि सोशल मीडिया पोस्ट के मामलों में तब तक गिरफ्तारी नहीं की जा सकती जब तक कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी कर आरोपी को सुनवाई का अवसर न दिया जाए। स्वीकार किया गया है कि वर्तमान मामले में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।”
जस्टिस नागप्रसन्ना ने आगे कहा,
“सुप्रीम कोर्ट के सतेंद्र कुमार अंटिल मामले में दिए गए निर्णय के आलोक में अगली सुनवाई की तारीख तक याचिकाकर्ता के खिलाफ आगे की सभी जांच पर अंतरिम रोक लगाई जाती है।”
मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी को निर्धारित की गई।
इससे एक दिन पहले राज्य सरकार ने प्रभाकर भट्ट की याचिका का विरोध करते हुए दलील दी थी कि उनके भाषण से समुदायों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की गई और इससे युवाओं में किसी विशेष समुदाय के प्रति घृणा की भावना पनप सकती है।