व्हाट्सऐप पर गिरफ्तारी की सूचना, बिना सेवा के प्रमाण पर्याप्त नहीं: हाइकोर्ट ने दी जमानत
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि किसी आरोपी की गिरफ्तारी की सूचना परिजनों को केवल व्हाट्सऐप के माध्यम से भेज देना और उसकी वास्तविक सेवा का कोई प्रमाण न होना, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 48 का समुचित पालन नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी और आरोपी जमानत का हकदार होगा।
यह आदेश जस्टिस संजीव कुमार शर्मा ने जमानत आवेदन पर सुनवाई करते हुए पारित किया। मामला मादक पदार्थ अधिनियम की धारा 20(बी)(2)(सी)/29 के तहत दर्ज किया गया था।
अभियोजन के अनुसार 19 जुलाई, 2025 को पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को ट्रॉली बैग के साथ संदिग्ध अवस्था में घूमते हुए पाया। पुलिस को देखकर वे भागने की कोशिश करने लगे जिसके बाद उन्हें पकड़ा गया। तलाशी के दौरान उनके बैग से कुल 75.4 किलोग्राम संदिग्ध गांजा बरामद होने का दावा किया गया।
आरोपियों को 20 जुलाई, 2025 को गिरफ्तार कर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट बोंगाईगांव के समक्ष पेश किया गया और वे तब से न्यायिक हिरासत में थे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि BNSS की धारा 47 और 48 के तहत जारी नोटिस विधि के अनुरूप नहीं थे। उनका कहना था कि नोटिस अंग्रेजी भाषा में तैयार किए गए जिसे वे समझते नहीं हैं।
साथ ही धारा 48 के तहत परिजनों को भेजी गई सूचना की वास्तविक सेवा का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। परिवार के सदस्य न तो अंग्रेजी समझते हैं और न ही उन्होंने किसी प्रकार की प्राप्ति की पुष्टि की।
जस्टिस संजीव कुमार शर्मा ने आदेश में कहा,
“रिकॉर्ड में उपलब्ध धारा 48 के नोटिसों से प्रतीत होता है कि वे अंग्रेजी भाषा में तैयार किए गए और परिजनों को व्हाट्सऐप संदेश के माध्यम से भेजे गए लेकिन सेवा का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। वास्तविक सेवा के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि धारा 48 BNSS का विधिवत पालन हुआ है।”
हाइकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी अवैध हो जाती है, जिससे आरोपियों को जमानत का अधिकार प्राप्त होता है।
अदालत ने आदेश दिया कि बाप्पी सरकार नबा दास और संजय सिंग को एक-एक लाख रुपये के मुचलके तथा समान राशि के दो-दो जमानतदारों पर रिहा किया जाए, जो ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अधीन होगा।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रिहाई के बाद जांच अधिकारी को यह स्वतंत्रता होगी कि वह आवश्यक कारणों और आधारों सहित रिमांड या पुलिस अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। बशर्ते गिरफ्तारी के आधारों की लिखित प्रति उपलब्ध कराई जाए और पूर्व में न देने के कारणों का स्पष्टीकरण भी दिया जाए। मजिस्ट्रेट को ऐसे आवेदन पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए यथाशीघ्र और संभव हो तो एक सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।
इस प्रकार हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी से जुड़े कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन आवश्यक है और केवल औपचारिक सूचना भेजना पर्याप्त नहीं माना जाएगा।