असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में 'अयोग्य' व्यक्तियों को कैसे शामिल किया गया? गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम एनआरसी समन्वयक से पूछा

Update: 2020-10-29 08:31 GMT

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने हाल ही के एक फैसले में, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के समन्वयक को यह बताने का निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता का नाम इस तथ्य के बावजूद रजिस्टर में कैसे शामिल हो गया कि प्रासंगिक समय पर, उसके खिलाफ कार्यवाही जारी थी।

जस्टिस मनोजीत भुयन और जस्टिस सौमित्र सैकिया की खंडपीठ ने कहा, "असम राज्य समन्वयक, एनआरसी को एक व्यापक हलफनामा दायर करने दीजिए, और आवश्यक विवरणों के साथ स्थितियों को रिकॉर्ड पर लाने दीजिए, जिससे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में ऐसे व्यक्तियों ने जगह बना ली, जो कि अयोग्य थे और कानूनी रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में शामिल होने के दावेदार नहीं थे।"

नालबारी जिले की निवासी रहीमा बेगम द्वारा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के एक आदेश के खिलाफ, जिसमें उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया था, शुरू की गई कार्यवाही में यह आदेश पारित किया गया।

न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता का नाम एनआरसी में मौजूद था, जबकि उसके खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई थी और पुलिस अधीक्षक (सीमा), नलबाड़ी द्वारा किए गए संदर्भ के आधार पर जारी थी।

खंडपीठ ने दृढतापूर्वक कहा, "इस प्रकार नाम डालना कानून के खिलाफ है।"

पीठ ने आगे कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है और यह इकलौता उदाहरण नहीं है, कई मामलों में न्यायालय ऐसा देख चुका है और इसी प्रकार के मुद्दों को दर्ज कर चुका है।

समन्वयक को 3 सप्ताह के भीतर 19 अक्टूबर को हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया गया है।

असम एनआरसी की अंतिम सूची, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप, 31 अगस्त, 2019 को प्रकाशित की गई थी। उक्त सूची में 3.3 करोड़ आवेदकों में से 19 लाख से अधिक (19,06,657) को बाहर कर दिया गया था।

एनआरसी की प्रक्रिया की शुरूआत 1985 में असम के नेताओं और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच एक समझौते के बाद हुई ‌थी, जिसे असम समझौता नाम दिया गया था। असम छात्र संगठनों ने बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों के असम से बाहर न‌िकालने की मांग को लेकर छह साल तक आंदोलन किया था, जिसके बाद 1985 का समझौता हो पाया था।

25 मार्च, 1971, जिस दिन बांग्लादेश युद्ध शुरू हुआ था, को नागरिकता का निर्धारण करने के लिए कट-ऑफ डेट के रूप में चुना गया था। उस तारीख के बाद असम में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अवैध प्रवासी माना जाता है।

1985 में किए गए संशोधन के माध्यम से समझौते को नागरिकता अधिनियम 1955 में सम्मिलित धारा 6ए द्वारा वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

एनआरसी में शामिल होने के लिए, किसी आवेदक को यह स्थापित करना होगा कि वह कट ऑफ डेट से पहले भी असम में रहता था, या असम में अपनी पूर्वजों की विरासत का पता लगाना होगा, जो कि कट ऑफ डेट से पहले असम में रह रहे थे। यह विरासत दस्तावेजों के जर‌िए से स्थापित किया जाना है, जिसमें सरकार द्वारा अनुमोदित दस्तावेजों की एक सूची शामिल है।

यह प्रक्रिया लगभग तीन दशकों से निष्क्रिय पड़ी रही। असम एनआरसी को अपडेट करने लिए आवश्यक नियम 2003 में तैयार किए गए ।

हालांकि मामले में तेजी 2014 के बाद आई, जब जस्टिस गोगोई (जैसा कि वह तब थे) और नरीमन की एक पीठ 2009 में एक एनजीओ असम पब्लिक वर्क्स द्वारा दायर जनहित याचिका में प्रक्रिया को तेज करने का आदेश दिया।

तब से, सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ द्वारा प्रक्रिया की निगरानी की जा रही थी।

पहला मसौदा दिसंबर 2017 में प्रकाशित हुआ और 31 जुलाई 2018 को दूसरा मसौदा प्रकाशित किया गया था।

केस टाइटल: रहीमा बेगम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य।

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