अर्जेंट मामलों की सुनवाई के लिए‌ दिल्‍ली हाईकोर्ट ने बेंच बढ़ाने का फैसला किया

Update: 2020-04-20 09:16 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट की प्रशासनिक और सामान्य पर्यवेक्षण समिति ने अर्जेंट मामलों की सुनवाई के लिए बेंचों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया है। 17 अप्रैल के आदेशानुसार, बेंचों की संख्या एक डिवीजन बेंच से दो डिवीजन बेंच और दो सिंगल बेंच से चार सिंगल बेंच तक बढ़ा दी गई है।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल ‌की अध्यक्षता में समिति ने दो कोर्ट रूमों को (कोर्ट 20 और 23) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के इस्तेमाल के लिए नामित करने का फैसला किया है। इनका इस्तेमाल उन अधिवक्ताओं/वादियों द्वारा किया जाएगा, जिनके मामलों को अर्जेंट होने के कारण सूचिबद्घ किया जा चुका है, लेकिन वे अपने घरों/ कार्यालयों से वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई की स्थिति में नहीं हैं।

17 अप्रैल का आदेश दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित माथुर की ओर से भेजे गए एक पत्र पर विचार करने के बाद दिया गया है।

पत्र में निम्नलिखित मांगे की गई थी:

-चूंकि हमारे अधिकांश न्यायाधीश वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की तकनीक से परिचित हैं और ई-कोर्ट के काम कामकाज में सहज हैं, इसलिए बेंच की संख्या बढ़ाएं ताकि कम से कम दो अंकों की संख्या तक मामले सुने जा सके। (यानी 10-12 बेंच के आसपास)। ऐसा करने से बड़ी संख्या में मामलों का निस्तारण हो सकेगा। साथ ही वकीलों को आमदनी भी होगी, लॉकडाउन की अवधि में जिनकी उन्हें सख्त जरूरत है।

-दिल्ली की सभी अदलतों में उल्लेख के मानदंडों को सरल किया जाए, उसे "बेहद जरूरी" से केवल "जरूरी" कर दिया जाए। न्यायिक रजिस्ट्रार / अधिकारियों के समक्ष उल्‍लेख की अनुमति दी जाए, जो केस के सबंध में वकीलों/वादियों की चिंताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

-पुराने लंबित मामलों को भी सूचीबद्ध करने की अनुमति दी जा सकती है। मामलों को सूचीबद्घ करने में जमानत और स्टे के मामलों को वरीयत दी जाए।

-कोर्ट कॉम्प्लेक्स में एक कमरा ऐसे वकीलों को दिया जाए, जो तकनीकी के प्रयोग में सक्षम नहीं है और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जर‌िए सुनवाई नहीं कर सकते हैं।

मामलों की सुनवाई की प्रकृति के मुद्दे पर समिति ने स्पष्ट किया कि अदालत पहले से ही न केवल 'अत्यंत जरूरी मामलों' पर सुनवाई कर रही है, बल्कि 'जरूरी' मामलों को भी सुना जा रहा है।

इसके अलावा, जैसा कि रजिस्ट्रार द्वारा सूचित किया गया है, लंबित मामलों में तात्कालिकता की भी जांच की जा रही है और सुनवाई के लिए उठाए जा रहे हैं।

मामले की तात्कालिकता की जांच के मुद्दे पर समिति ने कहा कि रजिस्ट्रार द्वारा अस्वीकार किए गए मामले की तात्कालिकता को साबित करने के लिए भी पहले से ही एक तंत्र मौजूदा है।

कोर्ट की आईटी कमेटी की हेड, जस्टिस राजीव शकधर की ओर से दी गई जानकारियों के अनुसार, यदि रजिस्ट्रार द्वारा किसी मामले को अर्जेंट नहीं माना जाता है तो अनुरोध किए जाने पर, उसी मामले को जस्टिस हेमा कोहली द्वारा पुनर्विचार के लिए उठाया जाता है। इसलिए मामले की तात्कालिकता उनकी अदालत के कर्मचारियों द्वारा तय की जाती है।

"यदि किसी मामले को सूचीबद्ध किए जाने से इनकार किया जाता है तो उसे एक अन्य लिंक के जरिए आगे उठाया जा सकता है। उक्त लिंक वकील/पार्टी की ओर से दी गई जानकार‌ियों के अधार पर माननीय न्यायाधीश के पुनर्विचार के लिए पहले ही तैयार हो चुका होता है।"

इस जानकारी के आधार पर प्रशासनिक समिति ने आईटी समिति को ऐसे लिंक का पुनर्विकास करने को कहा है। साथ ही कहा कि एक बार लिंक शुरु हो जाए तो रजिस्ट्रार जनरल को उक्त प्रभाव का एक परिपत्र अपलोड करना चा‌हिए।

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