दिल्ली कोर्ट ने उन 17 छात्रों और पत्रकारों को ज़मानत दी, जिन्हें दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय राजधानी में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किया था।

पटियाला हाउस कोर्ट के ड्यूटी JMFC अनिमेष कुमार ने सोमवार रात 9 बजे चार अलग-अलग आदेश पारित किए। उन्होंने कहा कि आरोपी युवा हैं और वे आदतन अपराधी नहीं लगते।

जज ने कहा,

"उनका पूरा करियर अभी बाकी है। इसलिए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए आरोपियों को ज़मानत दी जाती है..."

अदालत ने माना कि आरोपियों पर लगे आरोप गंभीर प्रकृति के थे और MLC (मेडिकल रिपोर्ट) के अनुसार एक पुलिस अधिकारी को चोटें आई थीं।

अदालत ने कहा कि हालांकि किसी भी व्यक्ति को शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है, लेकिन ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों पर हमला करना एक गंभीर मामला है, जिसकी अनुमति शांतिपूर्ण विरोध की आड़ में नहीं दी जा सकती।

अदालत ने कहा,

"हालांकि, इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि मौजूदा मामले में शामिल सभी अपराध - धारा 132 BNS और 190 BNS के तहत दंडनीय अपराधों को छोड़कर - ज़मानत योग्य प्रकृति के हैं। यहां तक ​​कि धारा 132 BNS के तहत दंडनीय अपराध में भी अधिकतम 2 साल की सज़ा का प्रावधान है।"

ज्ञानेश कुमार पर मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) में अनियमितताओं की अनुमति देने का आरोप है।

दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने लोगों के बड़े समूहों को विरोध स्थल तक पहुंचने से रोका। हिरासत में लिए गए कई लोगों को बाद में रिहा कर दिया गया।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत FIR दर्ज की गईं, जिसमें एक लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की कथित अवज्ञा का आरोप है।

ये FIR नई दिल्ली ज़िले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए निषेधाज्ञा आदेशों के कथित उल्लंघन से संबंधित हैं। इन आदेशों के तहत बिना पूर्व लिखित अनुमति के पांच या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने, जुलूस निकालने, प्रदर्शन करने, पिकेटिंग करने, धरना देने और नारे लगाने पर रोक है।

बता दें, यह विवाद 'द इंडियन एक्सप्रेस' की 23 सितंबर की एक रिपोर्ट के बाद सामने आया। रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों पर आपत्ति जताई थी, जो उनकी जानकारी या मंज़ूरी के बिना चुनाव आयोग ने लिए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां मुख्य रूप से 'फॉर्म 6' में बदलाव, वोटर लिस्ट (इलेक्टोरल रोल) में नाम जोड़ने और हटाने और वोटर लिस्ट डेटाबेस तक पहुंच को सेंट्रलाइज़ करने जैसे मामलों से जुड़ी थीं।

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