बैंकों को छात्र के माता-पिता की खराब वित्तीय स्थिति के आधार पर एजुकेशन लोन देने से इनकार नहीं करना चाहिए: केरल हाईकोर्ट

Update: 2021-07-16 09:00 GMT

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में बैंक ऑफ इंडिया को याचिकाकर्ता को इस आधार पर लोन प्रदान करने का निर्देश दिया कि वह एक मेधावी छात्रा है और माता-पिता की वित्तीय स्थिति के आधार पर शैक्षिक ऋण (Educational Loan) के पुनर्भुगतान की संभावनाओं का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि,

"शैक्षिक ऋण देने के लिए आवेदक के माता-पिता की ऋण चुकाने की क्षमता पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। मेरे अनुसार माता-पिता की वित्तीय स्थिति बैंक के लिए शैक्षिक ऋण के लिए किए गए आवेदन पर विचार करने में बाधा नहीं होनी चाहिए। "

न्यायमूर्ति पीबी सुरेश कुमार ने याचिका की अनुमति देते हुए कहा कि उक्त सर्कुलर के संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी निर्देश के अनुसार बैंकों द्वारा तैयार की गई सभी शैक्षिक ऋण योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक मेधावी छात्र को केवल इस आधार पर उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर वंचित नहीं किया जाएगा कि उसके पास इसके लिए संसाधन नहीं हैं।

याचिकाकर्ता बीएएमएस द्वितीय वर्ष की छात्रा है, जिसके शैक्षिक ऋण के अनुरोध को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बैंक ऑफ इंडिया ने अस्वीकार कर दिया था। याचिकाकर्ता के अनुसार, उसने 2019 में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा, 2019 में अपनी रैंक के आधार पर राज्य की केंद्रीकृत आवंटन प्रक्रिया के माध्यम से एडमिशन प्राप्त किया।

चूंकि उसका परिवार पाठ्यक्रम के लिए पूरी शेष राशि नहीं जुटा सका और उनके पास संपूर्ण शेष फीस के लिए शैक्षिक ऋण प्राप्त करने के लिए कोई संपार्श्विक सुरक्षा (Collateral security) नहीं है, याचिकाकर्ता ने अपने पिता के साथ 7,50,000 रूपये के शैक्षिक ऋण के लिए बैंक में आवेदन किया, जिसके लिए बैंक द्वारा अपनी शैक्षिक ऋण योजना के संदर्भ में किसी प्रतिभूति पर जोर नहीं दिया जाता है।

हालांकि बैंक द्वारा उसे सूचित किया गया कि याचिकाकर्ता के अनुरोध पर विचार नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह दिखाने के लिए कोई संतोषजनक सबूत नहीं है कि वह बाद में फीस को वापस करने में सक्षम होगी और उसके पिता वर्तमान में अपने व्यवसाय से कोई आय नहीं कमा पा कर रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने यह देखते हुए संस्थागत फंडिंग के लिए एक नीति तैयार की है कि उच्च शिक्षा का उत्तरोत्तर निजीकरण हो रहा है और यह एक बहुत ही गंभीर मामला बन गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी योग्य छात्र को वित्तीय सहायता के अभाव में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर से वंचित न किया जाए। इसी तरह भारतीय रिजर्व बैंक ने उपयुक्त शैक्षिक ऋण योजना के लिए भारतीय बैंक संघ द्वारा तैयार किए गए शैक्षिक ऋण योजना का मॉडल का एक सर्कुलर भी जारी किया है।

कोर्ट ने कहा कि उक्त परिपत्र के संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार बैंकों द्वारा तैयार की गई सभी शैक्षिक ऋण योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक मेधावी छात्र को केवल इस आधार पर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर से वंचित नहीं किया जाएगा कि उसके पास इसके लिए संसाधन नहीं हैं।

उच्च शिक्षा के लिए 2015 में जारी मॉडल शिक्षा ऋण योजना में संशोधित मार्गदर्शन नोटों ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रासंगिक योजना है जिसका उद्देश्य मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा लेने के लिए आवश्यकता-आधारित वित्त प्रदान करना है और योजना के तहत शैक्षिक ऋणों की पुनर्भुगतान की संभावनाएं माता-पिता की वित्तीय स्थिति के आधार पर मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है बल्कि शिक्षा के बाद छात्रों के रोजगार के अनुमानित भविष्य की कमाई के आधार पर किया जाता है।

पीठ ने उपरोक्त तर्कों पर विचार करते हुए कहा कि यदि बैंक द्वारा उठाए गए तर्कों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह योजना के उद्देश्य को विफल कर देगा।

पीठ ने आगे कहा कि बैंक का यह मत है कि याचिकाकर्ता का परिवार पाठ्यक्रम के लिए याचिकाकर्ता द्वारा फीस का भुगतान करने की स्थिति में नहीं है और इसलिए याचिकाकर्ता ऋण का हकदार नहीं है। मेरे विचार से यह कानून में टिकाऊ नहीं है।

केस का शीर्षक: देविका सोनीराज बनाम जोनल मैनेजर, बैंक ऑफ इंडिया

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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