[अस्पतालों में मोबाइल पर प्रतिबंध] ' प्रतिबंध से मरीजों के मुक्त संचार का अधिकार प्रभावित होता है', कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार से प्रतिबंध में ढील देने को कहा

Update: 2020-10-01 13:57 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को उम्मीद जताई कि राज्य सरकार जनता के स्वास्थ्य के मुद्दों से समझौता किए बिना, अस्पतालों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध को ढीला करने के लिए उचित उपाय करेगी। अदालत ने कहा कि अस्पतालों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध के कारण असुविधा और अन्य समस्याएं हो रही है।

चीफ ज‌स्ट‌िस थोथाथिल बी राधाकृष्णन और जस्टिस अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार को केंद्र सरकार के उपयुक्त विभाग द्वारा इस संबंध में जारी निर्देश / सलाह का पालन करना चाहिए।

कोर्ट के समक्ष रिट याचिका

राज्य सरकार द्वारा अस्पताल परिसर में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को, और विशेष रूप से, उन अस्पतालों में, जहां COVID-19 मरीज भर्ती हैं, 4 रिट याचिकाओं के जर‌िए चुनौती दी गई थी। 22 अप्रैल, 2020 को जारी एक सरकारी आदेश में उक्त फैसला किया गया था।

राज्य सरकार ने इस आधार पर आदेश पारित किया था कि सेल फोन कोरोना वायरस के वाहक हो सकते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क यह था कि अस्पतालों में सेल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय मनमाना और बिना किसी आधार के है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा, "जब तक मरीज को सेल फोन के प्रयोग की अनुमति नहीं मिलती है, तब तक वह अपने परिवार से पूरी तरह कट जाएगा।"

याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि यद्यपि महामारी रोग अधिनियम, 1897 की धारा 2 के तहत, संबंधित अधिकारी उपाय अपना सकते हैं और महामारी के प्रसार को रोकने के लिए निर्देश जारी कर सकते हैं, हालांकि उनके कार्यों को तर्क की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

यह आरोप लगाया गया है कि इस प्रकार का प्रतिबंध लगाकर, राज्य सरकार ने अवैध रूप से मुक्त संचार के अधिकार पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो भारत के प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसमें COVID-19 से संक्रमित रोगी और उनके परिवार के सदस्य शामिल हैं।

आगे कहा गया था कि राज्य सरकार द्वारा लगाया गया निषेध संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) और 21 का उल्लंघन है।

यह भी कहा गया था कि मोबाइल फोन को प्रतिबंधित करना बेतुका है। मोबाइल फोन मरीजों को मानसिक रूप से ठीक रखकर उनकी ‌रिकवरी सुनिश्चित करते हैं।

राज्य सरकार का रुख

राज्य सरकार का कहना था कि COVID-19 महामारी के प्रकोप के मद्देनजर, सरकार ने ऐसे उपाय अपनाए, जिसे कि उसने सोचा था कि सभी के हित में होगा।

यह तर्क दिया गया था कि एक विचार यह था कि सेल फोन कोरोनावायरस के संभावित वाहक हो सकते हैं। चूंकि यह एक संभावना थी, इसलिए सरकार ने सुरक्षित रहना उचित माना। यह नहीं कहा जा सकता है कि सरकार का निर्णय बिना किसी आधार का था।

इसके अलावा, न्यायालय के समक्ष यह प्रस्तुत किया गया कि समय बीतने के साथ, लगाए गए प्रतिबंध को धीरे-धीरे समाप्त कर दिए गए है और अब अधिकांश अस्पतालों में सेल फोन का उपयोग करने की अनुमति दी जा रही है।

एमआर बांगुर और कलकत्ता मेडिकल कॉलेज जैसे अस्पतालों में, जहां अभी भी सेलफोन की अनुमति नहीं दी जा रही है, ऑडियो / वीडियो कॉलिंग के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गई है ताकि एक मरीज अपने परिवार के सदस्यों के संपर्क में रहे।

कोर्ट का विश्लेषण

न्यायालय ने सभी पक्षों की दलीलों पर विचार किया। न्यायालय ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि सेल फोन हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है।

"मोबाइल फोन हमारे दैनिक जीवन के साथ अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। वास्तव में, अगर हमारे पास सेल फोन नहीं है, तो हममें से कई लोग अलग-थलग महसूस करते हैं। लैंडलाइन फोन के दिन लगभग खत्म हो चुके हैं", कोर्ट ने कहा।

न्यायालय का विचार था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अस्पतालों में सेल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध अस्पताल में मौजूद रोगियों और अन्य लोगों के मुक्त संचार के अधिकार को प्रभावित करना है।

हालांकि, अदालत ने कहा, किसी को यह याद रखना चाहिए कि COVID-19 महामारी के अचानक प्रकोप के कारण, बड़े पैमाने पर दुनिया सहित तमाम देशों में सरकारों को अभूतपूर्व स्थिति का सामना करना पड़ा।

अदालत ने कहा, "दुनिया भर के चिकित्सा क्षेत्र समेत इस ग्रह के सभी लोगों को कोरोना वायरस ने आश्चर्यचकित किया था, जिसके बारे में कोई भी ज्यादा नहीं जानता था।"

कोर्ट ने कहा कि किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि वायरस को कैसे रोकना है या वायरस से कैसे बचना है। कोई मेडिकल प्रोटोकॉल भी नहीं था।

न्यायालय ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग नहीं थी। एक विचार यह था कि मोबाइल फोन कोरोना वायरस के संभावित वाहक हो सकते हैं।

कोर्ट ने आगे कहा कि यह सच है कि इस बात का कोई निर्णायक सबूत नहीं है कि मोबाइल फोन वायरस के संभावित वाहक हैं। यह भी उतना ही सच है कि कोई भी निर्णायक सबूत नहीं है कि मोबाइल फोन कोरोना वायरस के संभावित वाहक नहीं हो सकते।

उन परिस्थितियों में, न्यायालय ने कहा, "हम यह नहीं कह सकते हैं कि राज्य प्रशासन की ओर से उन अस्पताल परिसरों में, जहां कोरोना संक्रमित रोगियों का इलाज हो रहा था, मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से अनुचित, अव‌िवेकपूर्ण या मनमाना था। स्थिति ऐसी थी कि हर कोई COVID-19 के प्रसार को रोकने के तरीकों और साधनों की तलाश में अंधेरे में तीर मार रहा था। ऐसी स्थिति में, अक्सर लोगों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि ट्रायल एंड एरर के आधार पर फैसले लिए जाएं। स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए समाज पर प्रतिबंध लगाए गए, जिनका संवैधानिक अधिकारों पर प्रभाव हो सकता है।"

कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का फैसला विकृत या अनुचित नहीं था। अदालत ने आगे कहा कि राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से उन अस्पतालों में मोबाइल फोन की अनुमति नहीं दी जा रही है, जहां मरीज अपने परिवार के सदस्यों से संपर्क कर सकता है और वे एक दूसरे को वीडियो के माध्यम से भी देख सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाया गया एक अन्य मुद्दा यह था कि यदि अन्य अस्पताल अब मोबाइल फोन के उपयोग की अनुमति दे रहे हैं, तो कोई कारण नहीं है कि एमआर बांगुर अस्पताल और कलकत्ता मेडिकल कॉलेज अस्पताल मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध रहे।

राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता ने कहा कि इन दोनों अस्पतालों में अन्य अस्पतालों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण रोगी हैं और इसलिए इन दोनों अस्पतालों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध जारी है।

हालांकि, राज्य सरकार से कोर्ट प्रभावित नहीं हुई।

"यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है कि अन्य सभी अस्पताल पूर्वोक्त दो अस्पतालों की तुलना में कम गंभीर रोगियों का इलाज कर रहे हैं। हालांकि, हमें यकीन है कि राज्य प्रशासन का उपयुक्त क्षेत्र उक्त दो अस्पतालों यानी एमआर बांगुर अस्पताल और कलकत्ता मेडिकल कॉलेज अस्पताल की स्थिति का आकलन और संशोधन करेगा, और, जब तक कि उचित प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में दर्ज बहुत ही ठोस कारण नहीं है, इन दो अस्पतालों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध भी हटा दिया जाएगा।"

चार रिट याचिकाओं WPA 5374 ऑफ 2020, WPA 5376 ऑफ 2020, WPA 5416 ऑफ 2020 और WPA 5377 ऑफ 2020 को तदनुसार निपटाया गया।

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