इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोगों को इस्लाम में परिवर्तित करके भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोपी सरकारी कर्मचारी को जमानत देने से इनकार किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने हाल ही में अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करके लोगों को इस्लाम में परिवर्तित करके भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में केंद्र सरकार के एक कर्मचारी, इरफान शेख को जमानत देने से इनकार करने के आदेश को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की खंडपीठ ने विशेष न्यायाधीश, एन.आई.ए./ए.टी.एस./अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, लखनऊ के अक्टूबर 2021 के आदेश की पुष्टि करते हुए शेख को जमानत देने से इनकार किया।
पीठ ने कहा,
"मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से तथ्य यह है कि जांच अधिकारी ने उचित जांच के बाद, अपीलकर्ता के खिलाफ ठोस सबूत पाया है कि सह-अभियुक्त उमर गौतम और अन्य की मिलीभगत से, अपीलकर्ता विरोधी में शामिल है। सांकेतिक भाषा प्रशिक्षण और अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली में दुभाषिया के रूप में काम करते हुए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया है। हम अपीलकर्ता को जमानत देने के लिए कोई अच्छा आधार नहीं पाते हैं।"
क्या है पूरा मामला?
यूपी पुलिस ए.टी.एस. जानकारी मिली कि कुछ राष्ट्रविरोधी/असामाजिक तत्वों और धार्मिक संगठनों ने आईएसआई और विदेशी संगठनों के इशारे पर इस उद्देश्य के लिए विदेशों से फंड प्राप्त करके लोगों को इस्लाम में परिवर्तित करने में लिप्त हैं।
उक्त सूचना पर एवं पूछताछ के दौरान इस कथित अवैध धर्मांतरण रैकेट के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की गई और यह सामने आया कि एक उमर गौतम दूसरे धर्म के नागरिक को बड़े पैमाने पर मुस्लिम धर्म में परिवर्तित कराने में शामिल है और लगभग 1000 गैर-मुसलमानों ने परिवर्तित किया गया और मुसलमानों के साथ शादी कराई गई।
जांच में यह पाया गया कि गौतम ने उपरोक्त उद्देश्य के लिए एक गिरोह बनाया था और इरफान शेख (अपीलकर्ता), जो सांकेतिक भाषा प्रशिक्षण और अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली में एक दुभाषिया के रूप में कार्यरत था, इसकी सिंडिकेट का एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
इसे देखते हुए अपीलकर्ता सहित आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ सामग्री एकत्र करने और साक्ष्य हासिल करने के बाद शेख के खिलाफ आईपीसी की धारा 120 बी, 121 ए, 123, 153 ए, 153 बी, 295 ए, 298, 417 और धारा 3/5/8 उ.प्र. धर्म के गैरकानूनी धर्मांतरण का निषेध अध्यादेश, (अधिनियम) के तहत आरोप पत्र दायर किया गया।
आरोपी ने जमानत के लिए आवेदन किया, जिसे निचली अदालत ने अस्वीकार कर दिया और इसलिए, उसने राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 21 (4) के तहत अपील में उच्च न्यायालय का रुख किया।
तर्क
शेख के वकील ने तर्क दिया कि वह किसी भी एसोसिएशन का सदस्य नहीं है और न ही किसी अपराध में शामिल है और प्रारंभिक प्राथमिकी में उसका नाम नहीं था। न ही उसका सह-आरोपी उमर गौतम से कोई संबंध है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि वर्तमान अपराध के कमीशन में शेख की संलिप्तता जांच के दौरान पाई गई और यह रिकॉर्ड में आया कि उसने अवैध रूप से बहरे और गूंगे लोगों को हिंदू धर्म से इस्लाम में परिवर्तित कराया। उन्हें यह बताकर केंद्र सरकार का एक कर्मचारी, वह उक्त कार्य के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत है और ISLRTC में बैठे कई छात्रों को इस्लाम में परिवर्तित कराया।
न्यायालय की टिप्पणियां
अदालत ने कहा कि जांच के दौरान, जांच अधिकारी ने पाया कि नोएडा डेफ सोसाइटी में पढ़ने वाले कई छात्रों को मुस्लिम धर्म में परिवर्तित कराया गया और अपीलकर्ता / शेख विचाराधीन अपराध में शामिल है।
अदालत ने आरोपी उमर गौतम के निजी बैंक खातों में बड़ी राशि प्राप्त करने के संबंध में सबूतों को भी ध्यान में रखा और उमर गौतम के बेटे अब्दुल्ला उमर पर धर्मांतरण उद्देश्यों के लिए इस्लामिक दावा सेंटर की गतिविधियों को चलाने का आरोप लगाया।
शेख की भूमिका के संबंध में, न्यायालय ने पुलिस द्वारा की गई जांच को ध्यान में रखते हुए पाया कि शेख ने बहरे और गूंगे व्यक्तियों के धर्मांतरण में गलत बयानी आदि के माध्यम से एक अनिवार्य भूमिका निभाई है और मूक बधिर छात्र सांकेतिक भाषा में राजी करने में एक विशेष भूमिका निभाई थी।
इसे देखते हुए कोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और जमानत खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा।
अपीलकर्ता की ओर से एडवोकेट फुरकान पठान, एडवोकेट आरिफ अली और एडवोकेट ओपी तिवारी उपस्थित हुए।
केस का शीर्षक - इरफ़ान शेख @ इरफ़ान ख़ान बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी.
केस उद्धरण: 2022 लाइव लॉ 160
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