काश जजों की नियुक्ति भी उतनी ही तेज़ी से होती, जितनी चुनाव आयुक्तों की: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-07 09:08 GMT

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को टिप्पणी की कि काश जजों की नियुक्ति भी उतनी ही तेज़ी से होती जितनी चुनाव आयुक्तों की।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इस विधेयक के अनुसार, चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति एक चयन समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होंगे।

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश सीनियर वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति बहुत तेज़ी से की गई, जिसमें विपक्ष के नेता से कोई प्रभावी परामर्श नहीं किया गया। उन्होंने बेंच को बताया कि 2024 में, नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने के लिए अर्जी दायर की गई थी। हंसारिया ने दावा किया कि कोर्ट में इस अर्जी पर सुनवाई होने से पहले ही, केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जल्दबाज़ी में कदम उठाए।

उन्होंने कहा कि 13 मार्च, 2024 को विपक्ष के नेता को 200 नामों की शॉर्टलिस्ट दी गई। अगले ही दिन चयन समिति की बैठक हुई और ज्ञानेश कुमार तथा सुखबीर संधू के नामों का चयन कर लिया गया।

हंसारिया ने कहा,

"ऐसा तब होता है जब आप किसी एक व्यक्ति को असीमित अधिकार दे देते हैं। विपक्ष के नेता से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह एक ही दिन में इतने सारे नामों की पड़ताल कर लें?"

जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की,

"हम तो बस यही कह सकते हैं कि काश जजों की नियुक्ति में भी ऐसी ही तेज़ी दिखाई जाती। खासकर हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में।"

वहीं दूसरी ओर, बेंच इस दलील को मानने के लिए तैयार नहीं थी कि नियुक्तियां इतनी जल्दबाज़ी में इसलिए की गईं ताकि रोक लगाने वाली अर्जी पर होने वाली सुनवाई को बाधित किया जा सके। बेंच ने पूछा कि यह कैसे मान लिया जाए कि केंद्र सरकार को इस बात की जानकारी थी कि 15 मार्च को इस अर्जी पर सुनवाई होने वाली है।

जस्टिस दत्ता ने कहा,

"क्या आप बिना यह साबित किए कोई दुर्भावना या मकसद बता सकते हैं कि केंद्र सरकार को 15 मार्च की तारीख के बारे में पता था? जब आप चाहते हैं कि हम यह घोषणा करें कि कोई काम किसी खास मकसद से किया गया तो आपको हमें यह यकीन दिलाना होगा कि केंद्र सरकार को भी 15 मार्च की तारीख के बारे में पता था। इसीलिए (चयन की प्रक्रिया को) 14 मार्च को ही पूरा कर लिया गया।"

हंसारिया ने जब यह स्वीकार किया कि उनके पास केंद्र सरकार को ऐसी जानकारी होने की बात साबित करने के लिए कोई सामग्री नहीं है तो जस्टिस दत्ता ने उनसे इस दलील पर ज़ोर न देने को कहा।

उन्होंने कहा,

"चलिए, बात यहीं खत्म करते हैं।"

हंसारिया ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता किसी भी व्यक्तिगत चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि वह इस अधिनियम की वैधता पर सवाल उठा रहा है।

मामले पर बहस जारी है।

Case Title: RANI KAPUR Versus PRIYA SACHDEV KAPUR AND ORS., SLP(C) No. 13943-13945/2026

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