वन्यजीव निगरानी और आदिवासियों की निजता: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से मंत्रालय से संपर्क करने को कहा

Update: 2026-03-20 13:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार किया। इस याचिका में आरोप लगाया गया कि देश भर के जंगलों और टाइगर रिज़र्व इलाकों में लगाए गए कैमरा ट्रैप और ड्रोन जैसी निगरानी तकनीकें, बिना किसी सूचना या सहमति के आदिवासी समुदायों की पहचान योग्य तस्वीरें ले रही हैं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को सक्षम अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने की अनुमति दी।

यह याचिका कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने दायर की थी, जिसमें देश भर के वन क्षेत्रों में संरक्षण निगरानी तकनीकों के दुरुपयोग के खिलाफ अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने दलील दी कि यह मामला जंगल में रहने वाली महिलाओं की निजता से जुड़ा है। याचिका में ऐसे दिशानिर्देशों की मांग की गई ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इस डेटा का इस्तेमाल आदिवासी महिलाओं के खिलाफ न हो। खुर्शीद ने अनुरोध किया कि इस मामले की जांच के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया जाए।

जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि वन्यजीवों के संरक्षण के लिए निगरानी कैमरे ज़रूरी हैं।

जस्टिस बागची ने कहा,

"यह काम सिर्फ़ वन रक्षकों के भरोसे नहीं हो सकता; हमें तकनीक का इस्तेमाल करना होगा, और ज़रूरत पड़ने पर ड्रोन का भी।"

खुर्शीद ने इस बात से सहमति जताई कि निगरानी से संरक्षण में मदद मिल रही है, लेकिन उन्होंने निजता के उल्लंघन का मुद्दा उठाया।

CJI ने कहा कि याचिकाकर्ता को सबसे पहले संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से एक अन्य सीनियर एडवोकेट प्रशांत कुमार सेन ने बताया कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों को अपनी बात लिखकर भेजी थी, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

खंडपीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को प्रस्तावित दिशानिर्देशों के साथ संबंधित अधिकारियों—जिनमें पर्यावरण और वन मंत्रालय भी शामिल है—से संपर्क करने की अनुमति दी।

इस याचिका में मुख्य रूप से उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया गया। इसमें कहा गया कि हालांकि कैमरा ट्रैप और ड्रोन जैसे उपकरणों का इस्तेमाल राज्य वन विभाग, अनुसंधान संस्थान और गैर-सरकारी संगठन वन्यजीवों और उनके प्रवास के तरीकों का अध्ययन करने के लिए बड़े पैमाने पर करते हैं, लेकिन डेटा के इस्तेमाल, संग्रह या उसे सुरक्षित रखने के संबंध में कोई एकसमान या कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा मौजूद नहीं है।

याचिका में कहा गया,

"हालांकि, वर्तमान में डेटा के इस्तेमाल, संग्रह या उसे सुरक्षित रखने के संबंध में कोई एकसमान या कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा मौजूद नहीं है। इस तरह के नियमों के अभाव में बड़े पैमाने पर और बिना किसी निगरानी के निगरानी की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।"

याचिका के अनुसार, नियमों की कमी के कारण बिना किसी निगरानी के सर्विलांस किया जा रहा है, जिसमें गलती से आदिवासी समुदायों के सदस्यों—जिनमें वन गुर्जर समुदाय की महिलाएं भी शामिल हैं—की निजी जगहों की तस्वीरें बिना किसी सूचना या सहमति के कैद हो गईं। याचिका में दावा किया गया कि इस तरह की रिकॉर्डिंग से लोगों में बेचैनी, व्यवहार में बदलाव और आजीविका में रुकावट आई; महिलाएं लगातार सर्विलांस के डर से अपने आने-जाने के तरीकों में बदलाव कर रही हैं और जंगल के कुछ खास इलाकों में जाने से बच रही हैं।

याचिका में आगे कहा गया कि जिन तस्वीरों में पारंपरिक या जीवन-यापन से जुड़ी गतिविधियों में लगे लोगों की पहचान हो सकती है, उनके गलत इस्तेमाल होने या उन्हें फैलाए जाने का खतरा बना रहता है, क्योंकि इस संबंध में कोई कानूनी या प्रशासनिक उपाय मौजूद नहीं है। इसमें तर्क दिया गया कि संरक्षण के लिए इस्तेमाल की जा रही मौजूदा सर्विलांस तकनीकें अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। इसके लिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली बेंच के 'के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ' मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया।

यह तर्क भी दिया गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी मौजूदा तकनीकी दिशा-निर्देशों में वन्यजीवों की निगरानी के लिए तो परिचालन संबंधी निर्देश दिए गए, लेकिन इन तकनीकों द्वारा कैद किए गए मानवीय डेटा की सुरक्षा से जुड़े उपायों पर कोई बात नहीं की गई। याचिका में इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया कि पहले से सूचना देने, सहमति लेने, गलती से कैद हुए मानवीय डेटा को हटाने और डेटा के प्रबंधन में पारदर्शिता बरतने से जुड़े प्रावधानों का अभाव है।

याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश) नियम, 2011, साथ ही डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि इस तरह का डेटा इकट्ठा करने वाले प्राधिकरण 'मध्यस्थ' (Intermediaries) या 'डेटा न्यासी' (Data Fiduciaries) के तौर पर काम करते हैं। उन्हें सुरक्षा के उचित उपायों को अपनाना अनिवार्य है। इसमें कहा गया कि प्रभावित व्यक्ति 'डेटा प्रधान' (Data Principals) की श्रेणी में आते हैं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था के तहत उन्हें 'सहमति प्रबंधक' (Consent Managers) या 'शिकायत निवारण तंत्र' जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं।

याचिका में यह भी कहा गया कि इसी तरह की तकनीकें अन्य संरक्षित क्षेत्रों—जैसे कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, हेमिस राष्ट्रीय उद्यान और रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान—में भी इस्तेमाल की जा रही हैं, और जिम कॉर्बेट में सामने आई ये समस्याएं पूरे देश में मौजूद हो सकती हैं।

मामले की सुनवाई के बाद न्यायालय ने उक्त रिट याचिका स्वीकार करने से इनकार किया और याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि वे संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात (अभ्यावेदन) रख सकते हैं।

Case Title – Trishant Tapankumar Simlai v. State of Uttarakhand

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