'कंबाला दौड़ को कर्नाटक के कुछ ही इलाकों तक क्यों सीमित रखा जाए?': सुप्रीम कोर्ट ने PETA की चुनौती खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने 'पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स' (PETA) इंडिया की याचिका खारिज की, जो कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक में कंबाला और बैलों की दौड़ को सिर्फ तटीय जिलों - दक्षिण कन्नड़ और उडुपी तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
PETA के वकील ने दलील दी कि ये कार्यक्रम बेंगलुरु के पैलेस ग्राउंड में आयोजित करने का प्रस्ताव है, जबकि ये बेंगलुरु की परंपरा और संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं।
इसके जवाब में जस्टिस मेहता ने कहा,
"वे राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अपनी संस्कृति दिखाना चाहते हैं, इसमें गलत क्या है? राज्य के दूसरे हिस्सों के लोगों को भी इस संस्कृति से परिचित होने का मौका मिलना चाहिए। इसे सिर्फ एक खास इलाके तक ही क्यों सीमित रखा जाए?"
मामला खारिज होने के बाद जस्टिस मेहता ने आगे कहा,
"किसी दिन हम PETA से भी कुछ सवाल पूछ सकते हैं... अभी के लिए इसे भूल जाइए। अभी हमसे उन सवालों को पूछने की उम्मीद मत कीजिए।"
संक्षेप में कहें तो PETA ने दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों के बाहर भैंसों की दौड़ आयोजित करने की अनुमति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह तर्क दिया गया था कि अन्य जगहों का इस खेल से कोई पारंपरिक या सांस्कृतिक जुड़ाव नहीं है और ये कार्यक्रम पूरी तरह से व्यावसायिक कारणों से आयोजित किए जा रहे हैं।
विवादित आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि न तो राज्य के 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम' में 2017 के संशोधन ने, और न ही 'एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कंबाला दौड़ को सिर्फ तटीय जिलों तक सीमित किया।
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में PETA ने कहा,
"माननीय हाईकोर्ट ने, इसी माननीय अदालत के सामने कर्नाटक राज्य के अपने ही रुख के बिल्कुल विपरीत फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य के किसी एक हिस्से की परंपरा और संस्कृति को सिर्फ उसी हिस्से तक सीमित नहीं रखा जा सकता, क्योंकि ऐसा करना 'विभाजनकारी' हो सकता है। माननीय हाई कोर्ट यह पहचानने में चूक गया कि भैंसों की दौड़ आयोजित करना एक संज्ञेय अपराध है और यह कोई अधिकार का मामला नहीं है, सिवाय उन मामलों के जहां इसे 'कर्नाटक संशोधन अधिनियम' के तहत मिली छूट के सख्त पालन के साथ आयोजित किया जाता है।"
Case Title: PEOPLE FOR THE ETHICAL TREATMENT OF ANIMALS (PETA), INDIA Versus STATE OF KARNATAKA AND ORS., SLP(C) No. 8272/2026