अब एक धारणा बन गई है कि यदि मामला विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाता है तो परिणाम यही होगा: ज‌स्टिस मदन बी लोकुर

Update: 2024-02-24 14:22 GMT

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर ने शनिवार को कैम्पेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) की ओर से आयोजित एक सेमिनार में मास्टर ऑफ रोस्टर सिस्टम की अस्पष्टता खिलाफ खुलकर बात की, साथ ही लिस्टिंग की प्रक्रिया से मनमानी को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, "आज धारणा यह है कि जब मामला विशेष पीठ के समक्ष जाता है तो परिणाम पता होता है।" उन्होंने यह टिप्पणी सेमिनार में मौजूदा एक अन्य स्पीकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ के विचारों से सहमति व्यक्त करते हुए कही।

इंडियन सोसाइटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ, नई दिल्ली में सीजेएआर की ओर से एक सेमिनार की आयोजन किया गया था, जिसका विषय-"सुप्रीम कोर्ट न्यायिक प्रशासन और प्रबंधन- मुद्दे और चिंताएं" था। कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के पूर्व जजों, सीनियर एडवोकेटों आदि ने हिस्सा लिया। जस्टिस लोकुर ने अपने भाषण में उमर खालिद द्वारा सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत अर्जी वापस लेने का जिक्र भी किया।

उन्होंने कहा, "आपके पास उमर खालिद द्वारा जमानत मांगने का मामला है, जो लंबे समय से सूचीबद्ध नहीं है। इसमें 13 बार स्थगन हुआ है। आखिरकार, वकील ने कहा कि हम मामला वापस लेना चाहते थे क्योंकि वे जानते थे कि परिणाम क्या होने वाला है।"

यह कहते हुए कि ऐसे मुद्दे न्याय की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं, उन्होंने कहा, "एक बार जब आप (सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया) कंप्यूटर को सौंप देंगे, तो मनमानी का सवाल ही नहीं उठेगा"।

सीजेएआर द्वारा आयोजित सेमिनार का संचालन विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सह-संस्थापक आलोक प्रसन्ना ने किया। उल्लेखनीय है कि जस्टिस लोकुर चार जून, 2012 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने और 31 दिसंबर, 2018 को उन्होंने पद छोड़ दिया। शीर्ष न्यायालय में पदोन्नत होने से पहले वह गुवाहाटी हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे।

अगस्त 2019 में उन्होंने फिजी की सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली, पहली बार किसी भारतीय न्यायाधीश को किसी अन्य देश की सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया गया था। तीन साल बाद, 2022 में उन्हें 3 साल के कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त किया गया।

आज अपने भाषण में मास्टर ऑफ रोस्टर बिजनेस पर बोलते हुए उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज राजिंदर सच्चर को याद किया, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले को अपने बोर्ड से वापस लेने और तत्कालीन चीफ जस्टिस के समक्ष सूचीबद्ध करने के बारे में लिखा था।

"सुनवाई के दौरान, ऐसा प्रतीत हुआ कि न्यायमूर्ति सच्चर, जो एक महान नागरिक अधिकार कार्यकर्ता थे, एक विशेष दृष्टिकोण अपना रहे थे जो सरकार के लिए मददगार नहीं था... यह दिसंबर में किसी समय था... अदालत की छुट्टियां खत्म होने के बाद , जनवरी में...जस्टिस सच्चर ने पाया कि मामला उनके बोर्ड से छीन लिया गया है।

उन्होंने चीफ जस्टिस के पास यह सवाल उठाया, लेकिन कुछ नहीं हुआ...जहां तक मुझे पता है यह किसी चीफ जस्ट‌िस का पहला दस्तावेजी मामला था, किसी मामले को किसी विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने या उसे किसी विशेष पीठ से बाहर ले जाने के लिए मास्टर ऑफ रोस्टर की शक्ति का प्रयोग किया गया ताकि कोई ऐसा आदेश पारित न किया जा सके जो चीफ जस्टिस नहीं चाहते थे।''

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