सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि पूरी तरह से सिविल विवाद को आपराधिक मामले में तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक कि कथित अपराध के ज़रूरी तत्व मौजूद न हों।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमेइकपम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा,

"आजकल वादियों में सिविल विवादों को आपराधिक मामलों का रूप देने की प्रवृत्ति एक खुला सच है। अदालतों ने इन दोनों के बीच के बारीक अंतर को खत्म करने से वादियों को रोकने की कोशिश की है। हमने आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए ऐसा किया।"

यह टिप्पणी कर्नाटक में ज़मीन बेचने के एक असफल समझौते से जुड़े पावर-ऑफ-अटॉर्नी धारक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए की गई।

यह मामला तब शुरू हुआ, जब संभावित खरीदार तय समय के भीतर ज़मीन का सौदा पूरा नहीं कर पाए। इसके बाद ज़मीन मालिकों ने प्रॉपर्टी किसी तीसरे पक्ष को बेच दी, जिसके बाद संभावित खरीदारों ने 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (समझौते को लागू करवाने) के लिए सिविल केस और IPC की धाराओं 420, 423, 120-B और 34 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पहले ज़मीन मालिकों के खिलाफ FIR रद्द कर दी थी, यह मानते हुए कि विवाद मूल रूप से सिविल प्रकृति का है। हालांकि, बाद में उसने याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया, जो ज़मीन मालिक का पावर-ऑफ-अटॉर्नी धारक है।

चुनौती दिए गए आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस शर्मा द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि कथित सौदा वही है और सेल डीड (बिक्री विलेख) ज़मीन मालिकों द्वारा निष्पादित की गई, जबकि याचिकाकर्ता केवल 'पुष्टि करने वाले पक्ष' (Confirming Party) के रूप में काम कर रहा है। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता ने पावर-ऑफ-अटॉर्नी के तहत मिले अधिकार से ज़्यादा काम किया हो या ज़मीन मालिकों की जानकारी के बिना कोई काम किया हो।

कोर्ट ने कहा,

“हमारा साफ़ मानना ​​है कि हाईकोर्ट से गलती हुई। वह भी एक गंभीर गलती। FIR में ज़मीन मालिकों और याचिकाकर्ता, दोनों पर अपराध करने का आरोप लगाया गया। यह आरोप सेल डीड (बिक्री विलेख) के निष्पादन पर आधारित है और सेल डीड खुद ज़मीन मालिकों ने निष्पादित की थी। याचिकाकर्ता केवल एक पुष्टि करने वाली पार्टी (Confirming Party) था। यदि सेल डीड के निष्पादन के आधार पर ज़मीन मालिकों पर कोई आपराधिकता नहीं मढ़ी जा सकती तो याचिकाकर्ता के खिलाफ भी इसे कायम नहीं रखा जा सकता।”

IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के अपराध पर कोर्ट ने माना कि जब शिकायतकर्ता पैसे या संपत्ति देता है, तो उस समय धोखा और बेईमानी से प्रेरित करने का तत्व मौजूद होना चाहिए। यहां, आंशिक भुगतान 2012 में किया गया, जब संपत्ति को कानूनी रूप से हस्तांतरित किया जा सकता था, जबकि किसी तीसरे पक्ष को बाद में बिक्री लगभग चार साल बाद हुई, जब संभावित खरीदार बिक्री के समझौते के तहत निर्धारित समय-सीमा का पालन करने में विफल रहे।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“गौर करने वाली बात है कि धोखाधड़ी के अपराध के लिए एक धोखेपूर्ण कार्य की आवश्यकता होती है, जो संपत्ति/पैसे देने के लिए प्रेरित करे। आरोपों को सरसरी तौर पर देखने पर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि संपत्ति (यानी 19.11.2012 के बिक्री समझौते के समय प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा हस्तांतरित राशि) किसी धोखे के आधार पर हस्तांतरित नहीं की गई। उस समय संपत्ति को कानूनी रूप से प्रतिवादी संख्या 2 के पक्ष में हस्तांतरित किया जा सकता था और कोई धोखा नहीं था। बाद में बिक्री 2016 में हुई, जो प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा कथित रूप से पैसे देने के लगभग 4 साल बाद थी। इस प्रकार, धोखाधड़ी का मूल तत्व ही गायब है।”

कोर्ट ने IPC की धारा 423 को भी लागू नहीं माना, क्योंकि संबंधित दस्तावेजों में भुगतान/प्रतिफल (Consideration) के संबंध में कोई गलत बयान नहीं है।

इसने आगे कहा कि जब सभी के खिलाफ आरोप एक ही लेन-देन से उत्पन्न हुए हों, तो याचिकाकर्ता की आपराधिक जिम्मेदारी को ज़मीन मालिकों की जिम्मेदारी से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

तदनुसार, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही रद्द की।

परिणामस्वरूप, याचिका स्वीकार की गई।

Case Title : SUDHA RAKESH VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ANR.

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