CEC की नियुक्ति के मामले पर फ़ैसला लेने में सुप्रीम कोर्ट की 2 साल से ज़्यादा की देरी की कीमत
29 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया।
जहाँ जस्टिस दत्ता का मानना था कि बड़ी बेंच को मामला भेजने की केंद्र सरकार की मांग ज़रूरी नहीं थी, वहीं जस्टिस शर्मा की राय अलग थी। बाद में इस मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस शर्मा की निष्पक्षता पर सवाल उठे, क्योंकि पता चला कि उनके बेटे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ECI (चुनाव आयोग) के लिए स्टैंडिंग काउंसिल (सरकारी वकील) हैं।
हालांकि, इस फ़ैसले से पहले अहम संवैधानिक मुद्दा होने के बावजूद इस मामले की सुनवाई कई बार टाल दी गई। याचिकाकर्ताओं ने बार-बार ज़ोर दिया कि यह मामला सीधे तौर पर कोर्ट के 'अनूप बरनवाल' फ़ैसले के दायरे में आता है, लेकिन कोर्ट 2 साल से ज़्यादा समय (जनवरी 2024 से सितंबर 2026) तक कोई फ़ैसला नहीं ले पाया।
इस देरी के कारण CEC एक्ट के तहत कम से कम 3 लोगों को चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया गया। असल में, CEC ज्ञानेश कुमार - जिनके ECI प्रमुख के तौर पर कामकाज और SIR प्रक्रिया से जुड़े आरोपों पर विवाद हुआ था - 2023 के कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले CEC बने। गौरतलब है कि जब पूर्व CEC राजीव कुमार रिटायर होने वाले थे तो कोर्ट ने भरोसा दिलाया था कि वह नए CEC की नियुक्ति से पहले इस मामले की सुनवाई करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। आखिरकार, EC ज्ञानेश कुमार को CEC नियुक्त कर दिया गया।
इस पृष्ठभूमि में हम इस लेख में CEC एक्ट मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई देरी पर चर्चा करेंगे।
विवाद की शुरुआत
2 मार्च, 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब तक संसद इस बारे में कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति एक ऐसी समिति की सलाह पर करेंगे जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होंगे।
कोर्ट ने यह निर्देश इसलिए दिया ताकि यह पक्का किया जा सके कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति स्वतंत्र तरीके से हो और उन पर कार्यपालिका (सरकार) का कोई असर न हो। यह निर्देश अंतरिम (कुछ समय के लिए) था, जो तब तक लागू रहना था जब तक संसद संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई कानून नहीं बना लेती।
दिसंबर 2023 में, संसद ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' पारित किया। इसमें प्रावधान किया गया कि चुनाव आयुक्तों का चयन एक ऐसी समिति करेगी जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता शामिल होंगे।
जनवरी 2024 में लागू हुए इस कानून के बाद कई कानूनी मामले सामने आए। कांग्रेस नेता डॉ. जया ठाकुर, 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' और अन्य लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चयन समिति से CJI को हटाकर उनकी जगह केंद्रीय मंत्री (जिन्हें प्रधानमंत्री नामित करेंगे) को शामिल करने से समिति की स्वतंत्रता कम हो जाती है। यह भी कहा गया कि इस कानून से चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया में, और अंततः चुनावी प्रक्रिया में, कार्यपालिका का अनुचित दखल बढ़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट में शुरुआती सुनवाई और रोक लगाने से इनकार
CEC एक्ट की धारा 7 को चुनौती देने वाली पहली याचिका 12 जनवरी, 2024 को जस्टिस संजीव खन्ना (पूर्व CJI) और जस्टिस दीपांकर दत्ता के सामने आई। इस प्रावधान पर रोक लगाने की मांग की गई थी, लेकिन बेंच ने मौखिक रूप से इससे इनकार कर दिया। अप्रैल में जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया गया।
13 फरवरी, 2024 को एक और याचिका (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा दायर) पर नोटिस जारी करते हुए, जस्टिस खन्ना और दत्ता ने फिर से धारा 7 (जो नियुक्ति प्रक्रिया तय करती है) के अमल पर रोक लगाने से मौखिक रूप से इनकार कर दिया। इस याचिका को अप्रैल में होने वाली लंबित सुनवाई (डॉ. जया ठाकुर के मामले) के साथ जोड़ दिया गया।
इस बीच चुनाव आयुक्तों के पद पर दो रिक्तियां हुईं, क्योंकि EC अनूप चंद्र पांडे 14 फरवरी को पद से हट गए और EC अरुण गोयल ने 9 मार्च को इस्तीफा दे दिया। शॉर्टलिस्टिंग के बाद, सर्च कमेटी ने सिलेक्शन कमेटी को 6 नाम भेजे। 14 मार्च को ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को EC नियुक्त किया गया।
एक हफ्ते बाद 21 मार्च, 2024 को, जस्टिस खन्ना और दत्ता ने CEC एक्ट की धारा 7 के अमल पर रोक लगाने से इनकार करते हुए एक विस्तृत आदेश पारित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अंतरिम आदेश से अफरा-तफरी मचेगी और (तब होने वाले) लोकसभा चुनाव में बाधा आएगी। इसके बाद मामले को अगस्त के लिए टाल दिया गया। अगस्त में, अधिकारियों ने पेश होकर 6 हफ़्ते का समय मांगा। फिर मामले को नवंबर में अंतिम सुनवाई/निपटारे के लिए सूचीबद्ध किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए
हालांकि जस्टिस खन्ना और दत्ता ने धारा 7 के अमल पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने मौजूदा ECs (ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू) की नियुक्ति प्रक्रिया पर "चिंता" जताई, क्योंकि सर्च कमेटी ने सिलेक्शन कमेटी को केवल 6 (10 नहीं) उम्मीदवारों के नाम भेजे थे। विपक्ष के नेता (अधीर रंजन चौधरी) की इस बात पर गौर करते हुए कि उम्मीदवारों के नाम और जानकारी समय पर नहीं बांटी गई थी, बेंच ने सवाल किया कि 200 उम्मीदवारों में से 6 को कुछ ही घंटों में कैसे शॉर्टलिस्ट किया जा सकता है। यह माना गया कि EC का चयन सिलेक्शन कमेटी के सभी सदस्यों को उम्मीदवारों की पूरी जानकारी देने के बाद ही किया जाना चाहिए।
"इस कमी के बावजूद", बेंच ने कोई निर्देश देना सही नहीं समझा। उसने कहा कि उस स्टेज पर मामले को वापस भेजने (क्योंकि लोकसभा चुनाव होने वाले थे) से समस्या हल नहीं होगी। साथ ही, उसने सही "चेक एंड बैलेंस" सुनिश्चित करने के लिए 2 और EC की मौजूदगी को ज़रूरी माना।
जस्टिस सूर्यकांत के सामने कई बार सुनवाई टली
दिसंबर 2024 में, जस्टिस खन्ना ने CJI का पद संभालने के बाद खुद को मामले से अलग कर लिया और इसे जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के पास भेज दिया। 7 जनवरी 2025 को, जस्टिस कांत की बेंच ने मामले को 4 फरवरी के लिए लिस्ट किया। 8 जनवरी को, प्रशांत भूषण ने यह बताते हुए मामले का ज़िक्र किया कि CEC राजीव कुमार फरवरी (18 फरवरी) में रिटायर होने वाले थे। जवाब में, जस्टिस कांत की बेंच ने 4 फरवरी को मामले की सुनवाई करने की इच्छा जताई और वकील से 3 फरवरी को इसके बारे में याद दिलाने को कहा।
3 फरवरी को, हालांकि भूषण ने मामले का ज़िक्र करते हुए बताया कि CEC राजीव कुमार 18 फरवरी को रिटायर होने वाले थे, फिर भी जस्टिस कांत की बेंच ने इसे 12 फरवरी के लिए लिस्ट किया। 12 फरवरी को भी मामले की सुनवाई नहीं हुई। जस्टिस कांत की बेंच ने आदेश दिया कि इसे तय तारीख (19 फरवरी) को हटाया नहीं जाना चाहिए।
हालांकि, इस बीच EC ज्ञानेश कुमार को CEC (17 फरवरी) नियुक्त कर दिया गया। 18 फरवरी को, याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से 19 फरवरी को मामले की सुनवाई करने का अनुरोध किया। लेकिन उस तारीख को, SG तुषार मेहता ने समय मांगा और कहा कि वह तत्कालीन CJI संजीव खन्ना के सामने संविधान पीठ के एक मामले में व्यस्त थे। भूषण ने समय देने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि मामले को सिर्फ़ इसलिए नहीं रोका जाना चाहिए कि SG किसी दूसरे मामले में व्यस्त हैं। लेकिन जस्टिस कांत ने कहा कि अगर SG, CB मामले से फ़्री नहीं हो पाते हैं, तो बेंच समय देने पर विचार करेगी।
हुआ यह कि बेंच ने दूसरे मामलों पर सुनवाई शुरू कर दी। बाद में, याचिकाओं का ज़िक्र दो बार किया गया, लेकिन उन पर सुनवाई नहीं हुई। जब एक वकील ने कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए इन याचिकाओं पर सुनवाई ज़रूरी है और ECs की नियुक्ति में एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) का दबदबा देश के 140 करोड़ लोगों पर असर डाल रहा है तो जस्टिस कांत ने जवाब दिया, "सभी मामले बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमें नहीं लगता कि कोई भी मामला [दूसरे से बेहतर] है।" उठने से पहले, जज ने भूषण से कहा कि वे 19 मार्च को "कोशिश करें"।
इसके बाद यह मामला 19 मार्च को आया, लेकिन सीरियल नंबर 38 पर था। भूषण ने सुबह इसका ज़िक्र किया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इसकी बारी शायद ही आ पाएगी। वकील ने किसी दूसरे दिन इसे प्राथमिकता के साथ लिस्ट करने का अनुरोध किया। इसके जवाब में, जस्टिस कांत ने इस मामले को एक दिन में निपटाने की इच्छा जताई और कहा कि उस दिन बहुत कम ज़रूरी मामलों को ही लिस्ट किया जाएगा ताकि इस मामले की सुनवाई हो सके।
अगली तारीख (16 अप्रैल) पर, मामला सीरियल नंबर 31 पर लिस्ट हुआ। भूषण ने फिर से इसका ज़िक्र किया और बताया कि शायद इसकी बारी न आ पाए। इसके बाद जस्टिस कांत की बेंच ने मामले को मई तक के लिए टाल दिया, ताकि इसे खास तौर पर दोपहर 2 बजे सुना जा सके। हालांकि, 14 मई को मामले को फिर से टाल दिया गया - इस बार 24 जुलाई तक के लिए। उस तारीख पर, मामले को 25 सितंबर तक के लिए टाल दिया गया।
इसके बाद मामला 14 अक्टूबर को आया। इस तारीख पर भी, मामले की बारी नहीं आई। जब भूषण ने इसका ज़िक्र किया, तो 11 नवंबर की तारीख दी गई। वकील ने कोर्ट को बताया कि मामला समय-समय पर लिस्ट तो हो रहा है, लेकिन उस पर सुनवाई नहीं हो रही है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि किसी दिन 3-4 घंटे का समय दिया जाए, जिसमें से याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने के लिए 2 घंटे की ज़रूरत थी। जस्टिस कांत ने उनसे कहा कि वे 11 नवंबर की सुबह मामले का ज़िक्र करें, ताकि कम ज़रूरी मामलों को टाला जा सके।
इसके बाद, 11 नवंबर, 11 दिसंबर और 10 मार्च को भी मामले पर सुनवाई नहीं हुई। 20 मार्च 2026 को, CJI का पद संभालने के बाद जस्टिस कांत ने हितों के टकराव (क्योंकि 2023 के कानून ने CJI को सिलेक्शन पैनल से हटा दिया था) का हवाला देते हुए खुद को इस मामले से अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि इस मामले की सुनवाई न तो CJI करेंगे और न ही CJI बनने की कतार में मौजूद कोई जज करेगा। इसके बाद, 7 अप्रैल को यह मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच के सामने लिस्ट किया गया।
इसलिए, 7 जनवरी 2025 से 20 मार्च 2026 तक यह मामला जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने रहा, लेकिन इस पर कोई असरदार सुनवाई नहीं हुई। कम से कम 10 तारीखों पर यह सुनवाई के लिए आया, लेकिन किसी न किसी वजह से इसे टाल दिया गया या इस पर सुनवाई नहीं हुई।
इस मामले पर जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय
7 अप्रैल को, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले को 6 मई को लिस्ट करने का आदेश दिया, ताकि नए मामलों के तुरंत बाद इस पर सुनवाई हो सके।
6 मई को केंद्र सरकार ने फिर से सुनवाई टालने की मांग की। सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि वह सबरीमाला मामले में 9 जजों की बेंच के सामने हो रही सुनवाई में व्यस्त थे। हालांकि, जस्टिस दत्ता ने सुनवाई टालने की मांग ठुकरा दी और कहा कि यह मामला किसी भी अन्य मामले से ज़्यादा ज़रूरी है। SG की बार-बार की गुजारिश के बावजूद, बेंच (जिसमें जस्टिस एससी शर्मा भी शामिल थे) अपनी बात पर अड़ी रही। बेंच ने कहा कि SG के सहयोगी उस दिन के लिए नोट्स ले सकते हैं, जबकि याचिकाकर्ता अपनी दलीलें पेश करना शुरू कर सकते हैं।
इसके बाद इन मामलों पर 4 तारीखों (6 मई, 7 मई, 14 मई और 30 जुलाई) को सुनवाई हुई। बीच में कोर्ट के कुछ दिन आंशिक रूप से काम करने के बावजूद, सुनवाई 4 तारीखों में पूरी हो गई और 30 जुलाई को बड़ी बेंच को मामला भेजने के मुद्दे पर आदेश सुरक्षित रख लिया गया। 23 सितंबर को ये आदेश 'स्प्लिट वर्डिक्ट' (बंटी हुई राय) के रूप में सुनाए गए।
रोक लगाने से इनकार और सुनवाई में देरी पर सवाल
2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवादित कानून पर रोक लगाने से इनकार करने का नतीजा यह हुआ कि जब मामला कोर्ट में विचाराधीन था, तब CEC एक्ट के तहत कम से कम 3 चुनाव आयुक्तों (ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) की नियुक्ति कर दी गई।
असल में, इन 3 चुनाव आयुक्तों में से 2 की नियुक्ति की प्रक्रिया पर जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता ने सवाल उठाए थे, लेकिन उन्होंने इसे होने दिया। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए किया गया ताकि उस समय होने वाले लोकसभा चुनावों में कोई "अराजकता" न फैले। इन ECs की अगुवाई में, ECI ने पूरे देश में वोटर लिस्ट में सुधार के लिए एक अभूतपूर्व 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' अभियान चलाया, जिससे लाखों वोटरों के वोट देने का अधिकार छिनने को लेकर बड़े पैमाने पर चिंताएं पैदा हुईं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता, जो उस बेंच का हिस्सा थे जिसने इस एक्ट की धारा 7 पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, ने अब अपनी शुरुआती राय ज़ाहिर की है कि सिलेक्शन कमिटी में एग्जीक्यूटिव (सरकार) के 2 सदस्यों के होने से EC की नियुक्ति प्रक्रिया पर एग्जीक्यूटिव को वीटो पावर मिल जाती है। जज ने यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री द्वारा नॉमिनेट किए जाने वाले केंद्रीय कैबिनेट मंत्री से सिलेक्शन प्रक्रिया में PM का विरोध करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन क्या ECs की सिलेक्शन कमिटी में PM और एक केंद्रीय मंत्री का शामिल होना—यानी एग्जीक्यूटिव का दबदबा—इतना साफ़ नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट 2024 में इस पर रोक लगा देता?
सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने CEC एक्ट को चुनौती देने वाले मामले को उतनी गंभीरता से लिया जितनी उसे मिलनी चाहिए थी, और क्या कोर्ट ने उन कभी न सुधारे जा सकने वाले नतीजों पर भी गौर किया जो इस देरी की वजह से हमारे देश के चुनावी लोकतंत्र पर पड़ेंगे?
अब, जब मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया है तो कौन जानता है कि अंतिम फैसले के लिए और कितने साल इंतज़ार करना पड़ेगा।