विदेशी तब्लीगी जमात : सुप्रीम कोर्ट ने जल्द निपटारे के लिए बिहार में दर्ज सभी FIR को एक साथ करने और एक ही अदालत में ट्रायल चलाने के आदेश दिए

Update: 2020-09-01 08:07 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तब्लीगी जमात की गतिविधियों में कथित संलिप्तता के लिए विदेशी नागरिकों के खिलाफ बिहार में दर्ज कई एफआईआर को एक साथ करने (Consolidate) करने की अनुमति दी और एक अदालत के समक्ष सभी मामलों को स्थानांतरित करने का आदेश दिया।

जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने पटना उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर एक विशिष्ट अदालत की पहचान करे जहां सभी मामलों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सके।

पीठ ने आगे कहा कि मामले की सुनवाई रोजाना की जाए ताकि 8 सप्ताह के भीतर मामले की सुनवाई तेज़ी से कर निपटारा किया जा सके। कोर्ट ने बिहार सरकार द्वारा एक हलफनामा दायर करने के बाद आवेदकों की प्रार्थना पर कोई आपत्ति ना जताने पर आवेदन को अनुमति दी।

दरअसल शीर्ष अदालत ने 25 अगस्त को 30 विदेशी नागरिकों द्वारा दायर किए गए आवेदन में राज्य सरकार से जवाब मांगा था, जो 6 FIR में आरोपी हैं और बिहार में विभिन्न अदालतों में ट्रायल का सामना रहे हैं। अपने आवेदन में, इन विदेशियों ने समेकित एफआईआर और शीघ्र मुकदमे की समान राहत के लिए प्रार्थना की थी, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के 34 याचिकाकर्ताओं के मामले में किया था।

इसी तरह का एक आवेदन अब उत्तर प्रदेश की विभिन्न अदालतों में चल रहे विदेशी नागरिकों द्वारा भी दायर किया गया है।पीठ ने यूपी सरकार से कहा है कि वह एक अदालत के समक्ष सभी मामलों को स्थानांतरित करने के लिए प्रार्थना में एक जवाबी हलफनामा दायर करे। अब इस मुद्दे पर 3 सितंबर को विचार किया जाएगा।

न्यायमूर्ति खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने 6 अगस्त को दिल्ली में सभी लंबित मामलों को साकेत में मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को हस्तांतरित करने का निर्देश दिया था, और तदनुसार सीएमएम को 8 सप्ताह के भीतर सभी मामलों को तेजी से निपटाने का निर्देश दिया था। 

उस दिन, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज़ में तब्लीगी जमात की गतिविधियों में कथित संलिप्तता के लिए विदेशी नागरिकों के खिलाफ नोटिस जारी किए गए हैं।

इस प्रकार, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया था कि ऐसे सभी विदेशी नागरिक, जिन्हें शुरू में गृह मंत्रालय द्वारा ब्लैकलिस्ट किया गया था,वो मुकदमे के लंबित रहने के दौरान देश छोड़ सकते हैं।

मुकदमों की स्थिति के बारे में पूछे जाने पर, मेहता ने अदालत को सूचित किया कि 34 मूल याचिकाकर्ताओं में से 10 ने अपना अपराध कबूलने के बजाय उनके खिलाफ आपराधिक मामलों को लड़ने के लिए चुना है।

एसजी ने आगे कहा था कि ये ट्रायल दिल्ली में विभिन्न न्यायालयों के समक्ष हैं और सुझाव दिया था कि उन्हें एक अदालत के सामने लाया जा सकता है जिसका शीघ्रता से निपटारा किया जा सकेगा। इस सुझाव से सहमत होते हुए, न्यायालय ने आदेश दिया था-

"... हमें यह उचित लगता है कि दिल्ली में विभिन्न ट्रायल कोर्ट में लंबित इन दस याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले एक ही अदालत में सुनवाई के लाए जाएं ताकि सभी मामलों का शीघ्रता से निपटारा किया जा सके। तदनुसार, हम इन मामलों को मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दक्षिण-पूर्वी दिल्ली, साकेत कोर्ट कॉम्प्लेक्स, साकेत को सीधे हस्तांतरित करते हैं और उक्त न्यायालय को आज से आठ सप्ताह के भीतर अधिमानतः सभी मामलों को निपटाने का निर्देश देते हैं। "

विदेशी नागरिकों को उनके घर वापस भेजने के मुद्दे पर, एसजी मेहता ने कहा कि जिन लोगों का ट्रायल चल रहा है, उन्होंने अपने देश वापस जाने का फैसला किया, वे माफी मांग सकते हैं और उन्हें वापस जाने की अनुमति दी जा सकती है। मेहता ने कहा कि मुकदमे का सामना कर रहे बाकी याचिकाकर्ताओं के पास भी न्यायालय के सामने केस के लिए जाने का विकल्प है।

सॉलिसिटर के इन सबमिशन को रिकॉर्ड करते हुए बेंच ने इस प्रकार भी नोट किया था-

"सॉलिसिटर जनरल ने भी, सभी निष्पक्षता में, प्रस्तुत किया है कि यदि संबंधित याचिकाकर्ता संबंधित आपराधिक मामले में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा परिकल्पित माफी मांगते हैं, तो उक्त याचिकाकर्ताओं को आपराधिक मामले के लंबित रहने के बावजूद भारत छोड़ने की अनुमति दी जा सकती है लेकिन ऐसे आदेशों के अधीन जो संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित किए जा सकते हैं ...

... सॉलिसिटर जनरल ने यह भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है कि आज तक केवल दस याचिकाकर्ताओं ने उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लड़ने का फैसला किया है और वे अपराध कबूल करने के विकल्प का उपयोग करने के लिए तैयार नहीं हैं। "

पृष्ठभूमि

2 अप्रैल को, प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने भारत में मौजूद 35 देशों के 960 विदेशियों को ब्लैकलिस्ट करने के सरकार के फैसले के बारे में बताया था।

इसके साथ ही ऐसे विदेशी नागरिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) के साथ-साथ दिल्ली पुलिस आयुक्त (सीपी) को आदेश जारी किए गए।

इसके आलोक में, सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि निर्णय एकतरफा और मनमाने ढंग से लिया गया था। उनकी याचिका में जोर दिया गया है कि बिना किसी नोटिस जारी किए या सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना ब्लैकलिस्ट करने का एक निर्णय न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का भीषण उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं, जिनमें से सभी को ब्लैकलिस्ट किया गया है, ने प्रस्तुत किया कि न केवल इस निर्णय के कारण उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है, बल्कि इसके परिणामस्वरूप राज्य प्रशासन ने अनके पासपोर्ट को जब्त कर लिया है। उन्होंने तर्क दिया कि कानून के तहत स्थापित प्रक्रिया के बिना ये कदम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पूर्ण अभाव है।

इस मामले की सुनवाई करते हुए, न्यायालय ने इन सभी विदेशी नागरिकों को उचित प्राधिकारी के समक्ष अपने व्यक्तिगत वीज़ा रद्द करने के आदेशों को चुनौती देते हुए अभ्यावेदन करने की अनुमति दी थी। हालांकि उनमें से एक निश्चित संख्या ने अपराध कबूल करने के लिए चुना था, कुछ अन्य लोगों ने ऐसा करने में आशंका व्यक्त की थी कि अगर वे किसी विदेशी देश में अपराध कबूलते हैं तो वे अपने घरेलू देशों में कठिनाइयों का सामना करेंगे। इसलिए, उन्होंने मुकदमे का सामना करने के लिए चुना था।

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