यूपी गैंगस्टर एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 में टकराव पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 के प्रावधान भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111 से टकराते हैं या नहीं। धारा 111 संगठित अपराध से संबंधित है।
कोर्ट ने इस संवैधानिक प्रश्न पर राज्य सरकार से जवाब मांगा।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट के तहत आरोपित विभिन्न व्यक्तियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। 22 जनवरी को जब इन मामलों की पहली बार सुनवाई हुई, तब सीनियर एडवोकेट अमित आनंद तिवारी, सिद्धार्थ दवे, विनय नवरे, अमित कुमार और संजय कुमार पाठक ने राज्य कानून और केंद्रीय कानून के बीच असंगति का मुद्दा उठाया।
इन याचिकाओं में यूपी गैंगस्टर एक्ट की कई धाराओं को चुनौती दी गई, जिनमें सजा से संबंधित धारा 3, विशेष अदालतों में प्राथमिकता के आधार पर मुकदमा चलाने से जुड़ी धारा 12, संपत्ति कुर्की से संबंधित धारा 14, संपत्ति की रिहाई से जुड़ी धारा 15, संपत्ति अर्जन की प्रकृति की जांच से संबंधित धारा 16 और जांच के बाद आदेश से जुड़ी धारा 17 शामिल हैं।
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश गैंगस्टर नियमावली, 2021 के कुछ नियमों को भी चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 300-ए का उल्लंघन करते हैं।
सीनियर एडवोकेट अमित आनंद तिवारी ने दलील दी कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 और यूपी गैंगस्टर एक्ट एक ही विषय क्षेत्र में लागू होते हैं और दोनों के बीच सीधा तथा असमाधेय टकराव है। उनका कहना था कि संसद ने धारा 111 के जरिए संगठित अपराध से निपटने के लिए एक व्यापक और संपूर्ण कानून बनाने का इरादा किया, जिससे राज्य का गैंगस्टर कानून अप्रासंगिक हो जाता है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का हवाला दिया, जिसमें दो जस्टिस की पीठ ने राज्य और केंद्र के कानूनों के बीच असंगति तय करने के लिए तीन कसौटियां निर्धारित की थीं। उस मामले में कोर्ट ने पश्चिम बंगाल आवास उद्योग विनियमन अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया था, क्योंकि उसी विषय पर केंद्र का रियल एस्टेट कानून पहले से मौजूद था।
इन कसौटियों के अनुसार, यह देखा जाता है कि क्या दोनों कानूनों में प्रत्यक्ष टकराव है, क्या संसद ने उस विषय पर पूर्ण कानून बनाने का इरादा किया, और क्या राज्य व केंद्र के कानून एक ही क्षेत्र में लागू होते हैं।
सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने भी राज्य कानून और भारतीय न्याय संहिता के बीच प्रत्यक्ष टकराव की ओर ध्यान दिलाया और उपरोक्त निर्णय की पहली कसौटी पर जोर दिया।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज और अधिवक्ता रुचिरा गोयल ने कहा कि असंगति के प्रश्न पर गहन अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने इस विषय पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर उपरोक्त कसौटियों के संदर्भ में अपना जवाब देने का निर्देश दिया।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तैयार किए गए दिशा-निर्देशों को अपनाया, जो गोरखनाथ मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में कोर्ट के संकेत के बाद बनाए गए। उस दौरान कोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट के कथित दुरुपयोग पर भी गंभीर चिंता जताई।