सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: विदेश से मेडिकल पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स को भी मिलेगा समान स्टाइपेंड
सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में साफ किया कि विदेश से मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय स्टूडेंट्स को भी इंटर्नशिप के दौरान वही स्टाइपेंड मिलेगा, जो भारत से मेडिकल पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स को दिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में किसी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने यह आदेश उन भारतीय नागरिकों की याचिका किया, जिन्होंने कजाकिस्तान, फिलीपींस, रूस और चीन से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की है। इन स्टूडेंट्स ने जून, 2023 से जून, 2024 के बीच झारखंड के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में अपनी एक साल की इंटर्नशिप पूरी की थी।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि उनसे जूनियर कुछ स्टूडेंट्स को जिन्होंने यूक्रेन और कजाकिस्तान से मेडिकल की पढ़ाई की, सुप्रीम कोर्ट के 15 जुलाई, 2025 के आदेश के बाद भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट्स के बराबर 26,300 प्रति माह स्टाइपेंड दिया गया। जबकि याचिकाकर्ताओं को यह लाभ नहीं मिला।
15 जुलाई के आदेश में यह दलील सामने आई कि स्टाइपेंड जारी करने से पहले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की अनुमति आवश्यक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व अनुमति न लेने के आधार पर यूजीसी कोई प्रतिकूल कार्रवाई न करे और स्टाइपेंड का भुगतान किया जाए।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की स्थिति उनके जूनियर स्टूडेंट्स के समान है, इसलिए उन्हें कम स्टाइपेंड देना भेदभावपूर्ण होगा। कोर्ट ने दो टूक कहा कि समान परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।
मामले का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट्स के बराबर स्टाइपेंड दो सप्ताह के भीतर अदा किया जाए।
यह फैसला विदेश से मेडिकल पढ़ाई करने वाले हजारों भारतीय स्टूडेंट्स के लिए राहत भरा माना जा रहा है, जो इंटर्नशिप के दौरान समान अधिकार और सुविधाओं की मांग कर रहे थे।