आयकर विभाग की तलाशी शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार

Update: 2026-03-09 11:05 GMT

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 132 तथा नए आयकर अधिनियम, 2025 (जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा) की संबंधित धारा 247 में निहित तलाशी और जब्ती से जुड़े प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने हालांकि याचिकाकर्ता को इन प्रावधानों में संशोधन या स्पष्टीकरण की मांग करते हुए भारत सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी। इसके बाद याचिका को वापस ली गई मानते हुए खारिज कर दिया गया।

खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े (एओआर प्रांजल किशोर की सहायता से) की उस दलील से असहमति जताई जिसमें उन्होंने इन प्रावधानों को असंवैधानिक बताया था।

याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्तियां

हेगड़े की मुख्य चिंता इस प्रावधान को लेकर थी कि आयकर अधिकारी तलाशी के कारणों का खुलासा न तो करदाता को करने के लिए बाध्य हैं और न ही आयकर अपीलीय अधिकरण को। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि कानून में ऐसे प्रावधान हैं जिनके तहत यह मानकर भी तलाशी और जब्ती की जा सकती है कि कोई व्यक्ति समन मिलने पर दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करेगा या अपनी संपत्ति कर उद्देश्यों के लिए प्रकट नहीं करेगा।

याचिकाकर्ता के अनुसार यह व्यवस्था एक तरह का “anticipatory search framework” बनाती है, जिसमें बिना किसी मौजूदा कानून उल्लंघन के भी अत्यधिक दखल देने वाली शक्तियों का उपयोग किया जा सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि नए कानून की धारा 247 आयकर अधिकारियों को “कंप्यूटर सिस्टम” और “वर्चुअल डिजिटल स्पेस” की तलाशी लेने की अनुमति देती है। इसमें व्यक्तिगत लैपटॉप, मोबाइल फोन, क्लाउड सर्वर, ईमेल और निजी डिजिटल संचार तक पहुंच शामिल हो सकती है।

हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा का अधिकार बरकरार

हेगड़े ने तर्क दिया कि कानून में पर्याप्त सुरक्षात्मक प्रावधान (safeguards) नहीं हैं, क्योंकि तलाशी के “reasons to believe” का खुलासा करने की आवश्यकता नहीं है और इस पर न्यायिक समीक्षा का प्रभावी अवसर भी नहीं है।

हालांकि पीठ ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ता की चिंताएं समझ में आती हैं, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा न्यायिक समीक्षा का अधिकार मौजूद है, इसलिए इन प्रावधानों को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस बागची ने कहा,

“हम आपकी चिंता समझते हैं कि यह प्रावधान न होता तो बेहतर होता, लेकिन जब न्यायिक समीक्षा का विकल्प उपलब्ध है तो हम इसे असंवैधानिक नहीं कह सकते। संसद की बुद्धिमत्ता पर हम सवाल नहीं उठा सकते।”

अदालत की टिप्पणियां

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानून में यह अनिवार्य है कि तलाशी से पहले अधिकारियों को “reasons to believe” लिखित रूप में दर्ज करने होते हैं। विवाद केवल इस बात का है कि इन कारणों का खुलासा किस चरण में किया जाए।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की आशंका अभी सैद्धांतिक (abstract) है। अदालत ने कहा कि कई बार कुछ प्रावधान संभावित दुरुपयोग की आशंका पैदा करते हैं, लेकिन समय के साथ उन्हें व्यवस्थित और संतुलित कर दिया जाता है।

चीफ़ जस्टिस ने कहा कि ऐसे प्रावधान अक्सर बड़े कर चोरी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाए जाते हैं।

डिजिटल तलाशी को लेकर याचिका की दलील

याचिका में कहा गया कि नया कानून आयकर अधिकारियों को डिजिटल उपकरणों और ऑनलाइन डेटा तक पहुंच की व्यापक शक्ति देता है, जिससे सूचनात्मक गोपनीयता (informational privacy) का गंभीर उल्लंघन हो सकता है।

याचिकाकर्ता ने पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि डिजिटल डेटा की प्रकृति अत्यधिक निजी और संवेदनशील होती है, इसलिए इस तरह की तलाशी पर कड़े संवैधानिक मानदंड लागू होने चाहिए।

याचिका में यह भी कहा गया कि पहले के फैसले तब दिए गए थे जब गोपनीयता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं मिली थी, इसलिए नए डिजिटल तलाशी प्रावधानों की संवैधानिकता की नई समीक्षा आवश्यक है।

याचिकाकर्ता ने अदालत से इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने या कम से कम उन्हें सीमित (read down) करते हुए पर्याप्त सुरक्षा उपाय और दिशानिर्देश तय करने की मांग की थी, ताकि आयकर अधिकारियों द्वारा डिजिटल तलाशी शक्तियों के दुरुपयोग को रोका जा सके।

Tags:    

Similar News