4 मई तक नाबालिग की प्रेग्नेंसी खत्म करने का आदेश लागू न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और AIIMS को अवमानना ​​के आरोपों की चेतावनी दी

Update: 2026-04-30 12:26 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना ​​याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में आरोप लगाया गया कि AIIMS, नई दिल्ली ने 15 साल की लड़की की 30 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी को मेडिकल तरीके से खत्म करने की अनुमति देने वाले कोर्ट के हालिया आदेश का पालन नहीं किया।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कथित अवमानना ​​करने वालों - स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रधान सचिव, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के सचिव और AIIMS, नई दिल्ली के निदेशक - को सोमवार, 4 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर तब तक आदेश का पालन नहीं किया गया तो वह आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा। यह आदेश नाबालिग लड़की की मां द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर पारित किया गया।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

"अगर वे सोमवार तक हमारे आदेश का पालन नहीं करते हैं तो वे अवमानना ​​की कार्यवाही में आगे के निर्देशों के लिए तैयार रहें। हमें किसी और चीज़ से कोई सरोकार नहीं है, सिवाय इसके कि इस कोर्ट के आदेश का पालन हो... अगर वे सोमवार तक पालन नहीं करते हैं, तो हम आरोप तय करेंगे। आरोप तय करने से पहले हम उनकी बात सुनेंगे।"

अवमानना ​​याचिका कोर्ट के 24 अप्रैल के आदेश से जुड़ी है, जिसमें नाबालिग की प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति दी गई। यह प्रेग्नेंसी सात महीने से ज़्यादा की हो चुकी थी। कोर्ट ने कहा था कि किसी महिला को सिर्फ़ इस आधार पर अवांछित प्रेग्नेंसी जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि बच्चे के जन्म के बाद उसे गोद दिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि गर्भवती महिला की पसंद सबसे ऊपर होनी चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ प्रेग्नेंसी को पूरे समय तक जारी रखने का निर्देश देना गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुंचाएगा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन करेगा। कोर्ट ने कहा कि अवांछित प्रेग्नेंसी को ज़बरदस्ती जारी रखना गर्भवती महिला के कल्याण को नकारना होगा और उसे अभी तक पैदा न हुए बच्चे के अधीन कर देगा।

कोर्ट नाबालिग की मां द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट' के तहत तय कानूनी सीमा से ज़्यादा समय होने पर भी प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति मांगी गई। भारत सरकार ने इस याचिका का विरोध किया था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि गर्भावस्था के इतने आगे के चरण में इसे समाप्त करना माँ और बच्चे, दोनों के जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकता है। उन्होंने सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के माध्यम से बच्चे को गोद देने का सुझाव भी दिया। उन्होंने आर्थिक सहायता देने की पेशकश भी की थी।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने नाबालिग लड़की की इच्छा जानने के लिए उसकी काउंसलिंग करवाने का अनुरोध किया था।

हालांकि, अदालत ने इस सुझाव को खारिज किया। अदालत ने कहा कि अगर कोई महिला अपनी गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती तो अदालत उसे आर्थिक मदद या बच्चे को गोद देने पर निर्भर रहने का निर्देश नहीं दे सकती।

अदालत ने इस बात पर गौर किया कि यह गर्भावस्था दो नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध का परिणाम थी। लड़की ने स्पष्ट रूप से इसे जारी न रखने की इच्छा जताई। अदालत ने AIIMS, नई दिल्ली में मेडिकल सुरक्षा उपायों के अधीन, गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी।

इसके बाद AIIMS ने पुनर्विचार याचिका (Review Petition) के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी, जिसे उसी पीठ ने खारिज किया। अदालत ने टिप्पणी की कि यह "अजीब" है कि AIIMS सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय वह नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों को विफल करने की कोशिश कर रहा है।

इसके बाद AIIMS ने उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) दायर की, जिसका ज़िक्र गुरुवार सुबह चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष किया गया। अदालत ने इस उपचारात्मक याचिका पर विचार करने से इनकार किया। साथ ही इस बात को दोहराया कि AIIMS महिला पर अपना फैसला थोप नहीं सकता। अदालत ने कहा कि महिला को सोच-समझकर फैसला लेने की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए।

ASG ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि भ्रूण 30 सप्ताह का हो चुका है और जीवित रहने में सक्षम है। ऐसे में गर्भावस्था को समाप्त करने से नाबालिग को ऐसा नुकसान पहुंच सकता है, जिसकी भरपाई संभव न हो। उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चे के जन्म तक इंतज़ार किया जाए। फिर उसे गोद देने के लिए सौंप दिया जाए। हालांकि, अदालत ने कहा कि किसी भी महिला पर उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था थोपी नहीं जा सकती।

जस्टिस बागची ने कहा कि सभी मेडिकल पहलुओं की जानकारी मिलने के बाद इस मामले में फैसला लेने का अधिकार लड़की और उसके परिवार का है, न कि AIIMS का कि वह इस मामले की दिशा तय करे। अदालत ने AIIMS के डॉक्टरों को लड़की की काउंसलिंग करने और मेडिकल रिपोर्ट साझा करने की अनुमति तो दी, लेकिन संस्था को अपनी बात पर ज़ोर देने के लिए दोबारा अदालत आने की अनुमति देने से इनकार किया।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अब यह अवमानना ​​कार्यवाही (Contempt Proceedings) शुरू की गई।

Case Title – S [Mother of N] v. Punya Salila Srivastava

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