चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को राहत: सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा पर रोक रखी बरकरार, हाईकोर्ट से 6 महीने में फ़ैसला करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार किया, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव की देवघर चारा घोटाले मामले में सज़ा पर रोक लगाई गई थी। साथ ही कोर्ट ने हाई कोर्ट से उनकी लंबित आपराधिक अपील पर 6 महीने के भीतर फ़ैसला करने का अनुरोध किया।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच झारखंड राज्य द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका झारखंड हाईकोर्ट के 12 जुलाई, 2019 के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई, जिसमें देवघर ट्रेजरी चारा घोटाले मामले में RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव की सज़ा पर रोक लगाई गई।
बेंच ने कहा,
"वकीलों की दलीलें सुनने के बाद हम इस आदेश में दखल देने के इच्छुक नहीं हैं, खासकर इसलिए क्योंकि तब से सात साल बीत चुके हैं। अपीलें 2018 की हैं, इसलिए हाईकोर्ट से सुनवाई में तेज़ी लाने का अनुरोध करना ही उचित होगा।"
बेंच ने कहा कि अपीलों पर 6 महीने के भीतर फ़ैसला करना बेहतर होगा।
राज्य की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने इस गलत आधार पर सज़ा पर रोक लगाई थी कि यादव ने अपनी सज़ा का 50% हिस्सा पूरा कर लिया है। उन्होंने बताया कि सज़ा पर रोक के लिए पहले दो आवेदन खारिज कर दिए गए और तीसरा आवेदन तथ्यात्मक रूप से गलत आधार पर मंज़ूर किया गया।
राजू ने तर्क दिया कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 427 लागू होगी, क्योंकि यादव को अलग-अलग मुकदमों से जुड़े कई चारा घोटाला मामलों में दोषी ठहराया गया। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक कोर्ट कोई और निर्देश न दे, बाद की सज़ाएं पिछली सज़ा पूरी होने के बाद ही शुरू होती हैं। उनके अनुसार, हाईकोर्ट ने जेल में बिताई गई अवधि की गणना करते समय सज़ाओं को एक साथ (concurrent) मानकर गलत किया।
राजू ने कहा, "इसके लिए अपनाया गया पैमाना ही गलत है," और जोड़ा कि देवघर मामले में सज़ा पिछली सज़ा पूरी होने के बाद ही शुरू होगी।
जस्टिस सुंदरेश ने हाईकोर्ट में लंबित अपील की स्थिति के बारे में पूछा। राजू ने जवाब दिया कि अपील पर सुनवाई नहीं हुई है और आरोप लगाया कि देरी के लिए आरोपी ज़िम्मेदार है।
यादव की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने राज्य की याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि सज़ा को सस्पेंड करने पर विचार करते समय धारा 427 का इस्तेमाल करके राज्य सरकार कानून की गलत बात सामने रख रही थी। सिब्बल ने कहा कि सज़ा साथ-साथ चलेंगी या एक के बाद एक, यह सवाल आखिरी चरण में उठेगा और हाईकोर्ट ने सज़ा सस्पेंड करने के लिए एक जैसा पैमाना अपनाकर अपने विवेक का इस्तेमाल किया था, जिसके तहत अपील करने वाले ने सज़ा का आधा हिस्सा पूरा कर लिया हो।
इस बात को ध्यान में रखते हुए कि आपराधिक अपील 2018 से लंबित है, सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा सस्पेंड करने के मामले में दखल देने से इनकार किया और इसके बजाय झारखंड हाईकोर्ट से अपील का जल्द निपटारा करने का अनुरोध किया।
Case: SLP(Crl) No. 1550/2020 THE STATE OF JHARKHAND Versus LALU PRASAD @ LALU PRASAD YADAV and connected matters