सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CBI अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश बरकरार रखा, कहा- कभी-कभी जांच करने वालों की भी जांच की जाए

Update: 2025-09-10 15:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का वह निर्देश बरकरार रखा, जिसमें दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त नीरज कुमार और इंस्पेक्टर विनोद कुमार पांडे के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। यह निर्देश वर्ष 2000 में CBI में प्रतिनियुक्ति के दौरान धमकाने, अभिलेखों में हेराफेरी और जालसाजी के आरोपों के बाद दिया गया था।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ 2001 में दो व्यक्तियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं में हाईकोर्ट के आदेशों के खिलाफ अधिकारियों की अपीलों पर विचार कर रही थी, जिसमें अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई। कथित अपराधों के समय, कुमार और पांडे क्रमशः संयुक्त निदेशक और निरीक्षक के रूप में CBI में प्रतिनियुक्त थे।

अदालत ने कहा,

"यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि यह अपराध वर्ष 2000 में हुआ था और आज तक इसकी जांच नहीं होने दी गई। अगर ऐसे अपराध की जांच नहीं की जाती, खासकर जब CBI में प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारियों की इसमें संलिप्तता हो तो यह न्याय के साथ खिलवाड़ होगा। कानून में यह अनिवार्य है कि न्याय न केवल किया जाए, बल्कि होते हुए भी देखा जाए। अब समय आ गया है कि व्यवस्था में आम जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए कभी-कभी जांच करने वालों की भी जांच की जाए।"

याचिकाकर्ता विजय अग्रवाल ने कुमार के खिलाफ उनके भाई द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत को वापस लेने के लिए कथित तौर पर दबाव डालने के आरोप में अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। दूसरे याचिकाकर्ता शीश राम सैनी ने CBI अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों की ज़ब्ती के दौरान प्रक्रियागत अनियमितताओं, धमकी और पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया।

शिकायतों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 506 (आपराधिक धमकी), 341 (गलत तरीके से रोकना), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 166 (लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना), 218 (लोक सेवक द्वारा गलत रिकॉर्ड तैयार करना), 463, 465, 469 (जालसाजी) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत आरोप लगाए गए।

2006 में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने पाया कि शिकायतों में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध पाए गए और दिल्ली पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के किसी सहायक पुलिस आयुक्त के पद से नीचे के अधिकारी के माध्यम से मामले की जांच करने का निर्देश दिया, जो 26 अप्रैल, 2005 को CBI के संयुक्त निदेशक द्वारा की गई प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों से स्वतंत्र हो।

हाईकोर्ट ने कथित अपराधों की गंभीरता पर प्रकाश डाला और कहा कि सैनी की शिकायत में दस्तावेज़ 26 अप्रैल, 2000 को ज़ब्त किए गए। हालांकि ज़ब्ती ज्ञापन 27 अप्रैल, 2000 को ही तैयार किया गया, जो CBI प्रक्रियाओं के विपरीत है।

हाईकोर्ट ने नोट किया कि अग्रवाल की शिकायत के अनुसार, पांडे ने 27 नवंबर, 2000 के ज़मानत आदेश का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए उन्हें 7 और 11 जून, 2001 को तलब किया और कुमार के खिलाफ उनके भाई की शिकायत वापस लेने के लिए उन पर दबाव डालने के लिए कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया।

सिंगल जज ने CBI की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट से असहमति जताई कि कोई अपराध नहीं बनता और जांच अधिकारी को रिपोर्ट पर विचार न करने का निर्देश दिया।

व्यथित होकर दोनों अधिकारियों ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष लेटर्स पेटेंट अपील दायर की, जिन्हें मार्च 2019 में सुनवाई योग्यता के आधार पर खारिज कर दिया गया। इस प्रकार, उन्होंने चार अपीलों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिनमें से दो सिंगल जज के आदेशों को चुनौती देती थीं और दो खंडपीठ द्वारा उनकी LPA खारिज करने को चुनौती देती थीं।

अधिकारियों ने तर्क दिया कि शिकायतें संज्ञेय अपराध नहीं हैं, हाईकोर्ट FIR दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकता। उन्होंने अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए ऐसा किया।

उन्होंने CBI की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट को खारिज करने और दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ, जो आमतौर पर आतंकवाद के मामलों की जांच करता है, द्वारा जांच के हाईकोर्ट के निर्देश को भी चुनौती दी।

CBI की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने जांच रिपोर्ट का बचाव करने के लिए CBI को पक्षकार बनाने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CBI, हाईकोर्ट के FIR दर्ज करने के निर्देश से व्यक्तिगत रूप से आहत नहीं है और उसने इन आदेशों को चुनौती नहीं दी। इसलिए अपीलों में उसे पक्षकार बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि प्रारंभिक जांच रिपोर्ट न्यायालय को यह निष्कर्ष निकालने से नहीं रोक सकती कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध मौजूद हैं। न्यायालय ने प्रदीप निरंकारनाथ शर्मा बनाम गुजरात राज्य मामले में हाल ही में दिए गए निर्णय का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि जब प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध सामने आते हैं तो FIR दर्ज करने से पहले शिकायतों की सत्यता की जांच करने की आवश्यकता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा,

"CBI की रिपोर्ट सर्वोत्तम रूप से FIR दर्ज होने से पहले प्रस्तुत की गई एक प्रारंभिक जांच रिपोर्ट होती है। हालांकि, FIR दर्ज होने से पहले कानून में ऐसी जांच की आमतौर पर परिकल्पना नहीं की जाती है। इसलिए यह कोई निर्णायक रिपोर्ट नहीं है, जिस पर संवैधानिक न्यायालय को शिकायतों में सामग्री या आरोपों के आधार पर यदि कोई हो, किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने के बारे में अपना निष्कर्ष दर्ज करने के अधिकार को समाप्त करने के लिए भरोसा किया जा सके।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां हाईकोर्ट को वैकल्पिक उपाय मौजूद हैं, वहां रिट याचिकाओं को हतोत्साहित करना चाहिए, वहीं वैकल्पिक उपाय न्यायालय को प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर FIR दर्ज करने का आदेश देने से नहीं रोकते। न्यायालय ने कहा कि पुलिस को शिकायत की वास्तविकता का आकलन किए बिना ही एफआईआर दर्ज करनी चाहिए।

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने पुलिस से संपर्क किया। हालांकि, कथित तौर पर CBI अधिकारियों की जांच करने में अनिच्छा के कारण पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

ऐसी परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि FIR दर्ज करने के निर्देश देने में हाईकोर्ट के विवेकाधिकार में हस्तक्षेप करने का कोई उचित कारण नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि संज्ञेय अपराधों के बारे में उसकी राय प्रथम दृष्टया निष्पक्ष है और जांच की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करती।

अदालत ने कहा,

"यदि संवैधानिक अदालत ने याचिकाओं पर विचार करने और दोनों अधिकारियों के विरुद्ध FIR दर्ज करने का निर्देश देने में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग किया है और यह संतुष्ट है कि प्रथम दृष्टया उनके विरुद्ध संज्ञेय अपराध का गठन हुआ है तो हमें ऐसे विवेकाधिकार में हस्तक्षेप करने का कोई उचित कारण नहीं दिखता।"

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेशों में संशोधन किया और कहा कि जांच विशेष प्रकोष्ठ के बजाय दिल्ली पुलिस द्वारा कम से कम सहायक पुलिस आयुक्त के पद के अधिकारी द्वारा की जाएगी और कुमार तथा पांडे को जांच में सहयोग करना होगा। न्यायालय ने CBI की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पर जांच अधिकारी द्वारा विचार करने की अनुमति दी, लेकिन कहा कि यह निर्णायक नहीं है।

अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच शीघ्रता से अधिमानतः तीन महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि FIR दर्ज करने से अधिकारियों के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं होगा, क्योंकि उन्हें इसमें भाग लेने का अवसर मिलेगा और किसी भी समापन या आरोप-पत्र को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है।

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