सिर्फ माता-पिता की सैलरी से OBC क्रीमी लेयर तय नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के तहत 'क्रीमी लेयर' का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्धारण में माता-पिता के पद और उनके सामाजिक-प्रशासनिक दर्जे को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए उन कई यूपीएससी अभ्यर्थियों को राहत दी, जिन्हें सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था क्योंकि उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर तय करना कानून के अनुरूप नहीं है। न्यायमूर्ति महादेवन ने अपने फैसले में कहा, “किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर में रखना केवल आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।”
मामला क्या था
यह विवाद उन अभ्यर्थियों से जुड़ा था जिन्होंने OBC नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया था। सत्यापन के दौरान कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने उनके माता-पिता की वेतन आय को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया। इनमें से कई अभ्यर्थियों के माता-पिता पीएसयू, बैंकों या अन्य संस्थानों में कर्मचारी थे।
सरकार ने 14 अक्टूबर 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का हवाला देते हुए कहा था कि यदि किसी पद की सरकारी पदों से समानता तय नहीं हुई है, तो आय के आधार पर क्रीमी लेयर का निर्धारण किया जा सकता है।
इस आधार पर जिन अभ्यर्थियों के माता-पिता की आय तय सीमा से अधिक थी, उन्हें OBC आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया गया।
1993 के आदेश की क्या व्यवस्था थी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1993 का कार्यालय ज्ञापन (OM), जो इंद्रा साहनी फैसले के बाद जारी हुआ था, स्पष्ट रूप से बताता है कि क्रीमी लेयर का निर्धारण मुख्य रूप से माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति के आधार पर होगा।
इस आदेश में यह भी कहा गया था कि वेतन और कृषि आय को आय/संपत्ति परीक्षण में शामिल नहीं किया जाएगा। आय का परीक्षण केवल उन मामलों में लागू होगा जहां पद के आधार पर सामाजिक स्थिति तय नहीं की जा सकती।
2004 के स्पष्टीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने कहा कि 2004 का स्पष्टीकरण इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि वह 1993 की नीति को कमजोर या निष्प्रभावी कर दे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की वेतन आय को जोड़कर क्रीमी लेयर तय करना गलत है और इससे संविधान में निहित आरक्षण की मूल भावना प्रभावित होती है।
अदालत ने यह भी कहा कि एक स्पष्टीकरण पत्र मूल नीति में नया नियम नहीं जोड़ सकता।
समानता के अधिकार का उल्लंघन
कोर्ट ने यह भी पाया कि सरकार की व्याख्या से सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच असमानता पैदा हो रही थी।
उदाहरण के लिए, यदि किसी ग्रुप C या ग्रुप D सरकारी कर्मचारी की आय बढ़ जाती है, तो उसके बच्चे को स्वतः क्रीमी लेयर नहीं माना जाता। लेकिन पीएसयू या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों को केवल आय अधिक होने के कारण क्रीमी लेयर माना जा रहा था।
अदालत ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
अदालत का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों के फैसलों को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कर दीं और निर्देश दिया कि संबंधित अभ्यर्थियों के मामलों पर इस फैसले के सिद्धांतों के अनुसार दोबारा विचार किया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि आवश्यक हो तो प्रभावित अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त पद (supernumerary posts) बनाए जाएं और यह प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जाए।